नफरत फैलाने वालों को हमेशा दिखाई थी औकात, जाते-जाते देश को ये सीख दे गए नाना पाटेकर
भारतीय सिनेमा के सबसे सशक्त और बेबाक अभिनेताओं में शुमार नाना पाटेकर के अचानक निधन की खबर ने पूरे देश को गहरे सदमे में डाल दिया है। 75 वर्ष की उम्र में गोवा में कार्डियक अरेस्ट के चलते उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। उनके यूं अचानक चले जाने से बॉलीवुड से लेकर राजनीतिक गलियारों तक शोक की लहर दौड़ गई है। सिनेमा और कला जगत में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए राज्य प्रशासन की ओर से उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किए जाने का निर्णय लिया गया है।
नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में एक साधारण मराठी हिंदू परिवार में हुआ था। उनका असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था, जिसे उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखने के बाद बदलकर 'नाना' कर लिया था। उनके पिता कपड़ा कारोबार से जुड़े थे। हालांकि, पारंपरिक हिंदू परिवार में जन्म लेने के बावजूद नाना पाटेकर का जीवन कभी भी संकीर्ण धार्मिक या जातीय दायरों में बंधा नहीं रहा। वे हमेशा से संप्रदायवाद और जातिवाद के कट्टर विरोधी रहे और उन्होंने सदैव इंसानियत व मानवता को ही अपना एकमात्र धर्म माना।
अपनी फिल्म 'वनवास' के प्रमोशन के दौरान उन्होंने धर्म और समाज के ताने-बाने पर खुलकर अपनी बेबाक राय रखी थी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि हमारी पहचान सबसे पहले एक भारतीय के तौर पर है और इंसानों का सबसे बड़ा मजहब सिर्फ और सिर्फ इंसानियत है। उन्होंने मजहब के नाम पर नफरत फैलाने और समाज को बांटने वालों को सीधे आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि हिंदू और मुस्लिम दोनों बराबर रूप से इस देश के नागरिक हैं, इसलिए उनके बीच किसी भी तरह की दीवार या अलगाव नहीं होना चाहिए। उनका यह विचार आज भी करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में गूंज रहा है।