'रामायण' पर बेस्ड पहली फिल्म, हीरो ने अकेले निभाया था राम और सीता दोनों का किरदार
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी महाकाव्य 'रामायण' (Ramayana) पर आधारित फिल्मों या धारावाहिकों का जिक्र होता है, तो सबसे पहले रामानंद सागर की 'रामायण' या फिर आधुनिक तकनीक से बन रही भव्य फिल्मों के नाम जेहन में आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय सिल्वर स्क्रीन पर भगवान श्रीराम के जीवन और महाकाव्य रामायण पर बनने वाली पहली फिल्म कौन सी थी और उसकी कहानी कितनी ज्यादा हैरान करने वाली थी? आज से लगभग एक सदी पहले जब सिनेमा अपने शुरुआती दौर में था और तकनीक के नाम पर आज जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं, तब भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के (Dadasaheb Phalke) ने साल 1917 में 'लंका दहन' (Lanka Dahan) के नाम से पहली ऐसी पौराणिक फिल्म बनाई थी जो सीधे तौर पर रामायण के प्रसंगों पर आधारित थी। इस फिल्म से जुड़ा सबसे दिलचस्प और रोचक किस्सा यह है कि उस दौर में फिल्मों में काम करने के लिए महिलाएं आगे नहीं आती थीं, जिसके चलते इस फिल्म के मुख्य नायक अन्ना सालुंके (Anna Salunke) ने भगवान श्रीराम के साथ-साथ माता सीता का किरदार भी अकेले ही निभाया था। भारतीय फिल्म जगत के शुरुआती संघर्ष और अनसुने अध्यायों से भरी यह कहानी आज के दौर के सिनेप्रेमियों को पूरी तरह हैरान कर देने के लिए काफी है।
साल 1917 का वह दौर जब मूक फिल्मों के जरिए सिल्वर स्क्रीन पर उतरी थी भगवान राम और रामायण की गाथा
बात उन दिनों की है जब भारत में सिनेमाघरों का कॉन्सेप्ट बिल्कुल नया था और पर्दे पर दिखाई जाने वाली फिल्में पूरी तरह से मूक (Silent Films) हुआ करती थीं। संवादों के बिना केवल अभिनय, हाव-भाव और स्क्रीन पर बीच-बीच में आने वाले अंग्रेजी या स्थानीय भाषा के टेक्स्ट (Intertitles) के सहारे पूरी कहानी दर्शकों तक पहुंचाई जाती थी। साल 1917 में जब दादा साहब फाल्के ने 'लंका दहन' फिल्म का निर्माण किया, तो देश के लोगों में रामायण के दृश्यों को पहली बार पर्दे पर देखने के लिए भारी क्रेज देखने को मिला था। उस समय के अखबारों में इस बात का जिक्र मिलता है कि लोग इस मूक फिल्म को देखने के लिए बैलगाड़ियों से मीलों का सफर तय करके सिनेमाघरों तक पहुंचते थे। फिल्म में रावण द्वारा सीता हरण, हनुमान जी की लंका यात्रा और भगवान श्रीराम की वानर सेना के साथ समुद्र पर पुल बांधने जैसे दृश्यों को उस जमाने की सीमित तकनीक के बावजूद जिस खूबसूरती से पर्दे पर उतारा गया था, उसने इतिहास रच दिया था।
जब एक ही अभिनेता ने निभाए राम और सीता दोनों के रूप: अन्ना सालुंके का वह ऐतिहासिक और अद्भुत अभिनय
सिनेमा इतिहास के पन्नों में दर्ज सबसे अनोखा तथ्य यह है कि फिल्म 'लंका दहन' में मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता अन्ना सालुंके ने दोहरी भूमिका निभाकर तहलका मचा दिया था। दरअसल, उस रूढ़िवादी और पारंपरिक दौर में महिलाएं फिल्मों में अभिनय करने को बहुत बड़ा सामाजिक कलंक मानती थीं और कोई भी अभिनेत्री पर्दे पर आने को तैयार नहीं थी। ऐसे में दादा साहब फाल्के के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वे माता सीता का किरदार किसके जरिए निभाएं। तब स्टूडियो के एक कर्मचारी और अभिनेता अन्ना सालुंके आगे आए और उन्होंने न केवल भगवान श्रीराम का पराक्रमी किरदार निभाया, बल्कि अपने चेहरे के हाव-भाव और मेकअप बदलकर पर्दे पर माता सीता की कोमल और मर्यादित भूमिका को भी अत्यंत जीवंत तरीके से निभाया। भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड है कि एक ही फिल्म के मुख्य नायक ने भगवान राम और माता सीता दोनों के रूप में पर्दे पर जान फूंक दी थी।
बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड: जब दर्शकों ने थियेटर में चढ़ाए थे सिक्के और अनाज
कहा जाता है कि 'लंका दहन' फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के मामले में उस दौर के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। जब इस फिल्म को सिनेमाघरों में दिखाया जाता था, तो भक्त इतने भावुक हो जाते थे कि वे पर्दे के सामने सिर झुकाकर पैसे, सिक्के, चावल और नारियल चढ़ाने लगते थे। उस जमाने में फिल्म के टिकटों की बिक्री सिक्कों के रूप में इतनी भारी मात्रा में हुई थी कि फिल्म निर्माताओं को बोरियों में भरकर सिक्के ले जाने पड़े थे। यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण था कि भारतीय दर्शकों के लिए सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि उनकी गहरी आस्था और धार्मिक भावनाओं से जुड़ा एक पवित्र अनुभव था। दादा साहब फाल्के की इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि भारतीय दर्शक पौराणिक कथाओं और संस्कृति पर आधारित कहानियों के प्रति कितने अधिक समर्पित हैं।
भारतीय सिनेमा और आधुनिक रामायण प्रोजेक्ट्स की प्रेरणा बनी साल 1917 की यह मूक फिल्म
आज जब बॉलीवुड और भारतीय फिल्म उद्योग में करोड़ों और अरबों रुपये के बजट से 'रामायण' को आधुनिक वीएफएक्स (VFX) और पैन-इंडिया स्केल पर बनाने की होड़ मची हुई है, तब हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि इस भव्य परंपरा की नींव रखने वाले दादा साहब फाल्के और अन्ना सालुंके जैसे महान कलाकारों का संघर्ष कितना बड़ा था। सीमित संसाधनों, बिना कैमरों की आधुनिक तकनीक और महिलाओं के अभिनय से इनकार करने जैसे विकट हालातों के बावजूद जिस निष्ठा के साथ 'लंका दहन' का निर्माण किया गया था, उसने भारतीय सिनेमा को दुनिया के नक्शे पर एक अलग पहचान दिलाई। यह फिल्म इस बात की मिसाल है कि अगर दिल में पक्का इरादा और अपनी संस्कृति से जुड़ाव हो, तो साधनों की कमी कभी भी सफलता के आड़े नहीं आती है।
सिनेमाई इतिहास का वह स्वर्णिम पन्ना जो आज भी नई पीढ़ी के लिए है एक अद्भुत अजूबा
संक्षेप में कहें तो, 'रामायण' पर आधारित पहली फिल्म 'लंका दहन' और उसके पीछे की यह अनकही कहानी भारतीय फिल्म जगत की उस स्वर्ण यात्रा का हिस्सा है जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए। एक पुरुष अभिनेता द्वारा राम और सीता दोनों के किरदार को पर्दे पर जीवंत कर देना और दर्शकों का उस मूक फिल्म के प्रति ऐसा पागलपन आज की आधुनिक डिजिटल दुनिया में किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। यह कहानी हमें यह याद दिलाती है कि कैसे हमारे सिनेमा के पुरखों ने विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए आज के इस विशाल मनोरंजन जगत की मजबूत नींव रखी थी, जो आज भी हमारी संस्कृति और इतिहास की सबसे अनमोल धरोहर बनी हुई है।