लव सॉन्ग समझकर जिसे गाते हैं लोग, असल में वो बेटे से बिछड़े पिता का दर्द है! रुला देगी 'जरा सामने तो आओ छलिये' के पीछे की ये अधूरी कहानी
संगीत और इंसान की संवेदनाओं का बहुत गहरा रिश्ता होता है। दुनिया में जितने भी कालजयी और रूह को छू लेने वाले गीत लिखे गए हैं, उनके पीछे अक्सर कोई न कोई गहरा दर्द या अधूरी दास्तान छिपी होती है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में भी एक ऐसा ही बेहद लोकप्रिय गाना है, जिसे सुनते ही आज भी लोगों की आँखें नम हो जाती हैं। 'जरा सामने तो आओ छलिये' और 'आ लौट के आजा मेरे मीत'— इन गानों को सुनकर अक्सर लोग इसे किसी प्रेमी-प्रेमिका के विरह का गीत मान लेते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इन मशहूर गानों की रचना किसी प्रेमिका के लिए नहीं, बल्कि एक लाचार पिता ने अपने लापता बेटे की याद में तड़पते हुए की थी।
छोटी सी बात पर नाराज होकर हमेशा के लिए घर छोड़ गया था लाडला बेटा
इस बेहद भावुक कर देने वाली कहानी के पीछे का दर्द मशहूर गीतकार पंडित भरत व्यास का है। भरत व्यास जी का एक बेटा था, जिसका नाम श्याम सुंदर दास था। श्याम सुंदर अपने पिता का बेहद लाडला था, लेकिन स्वभाव से वह थोड़ा ज्यादा संवेदनशील था, जिसे छोटी-छोटी बातें भी दिल पर लग जाती थीं। एक दिन किसी घरेलू बात पर पिता-पुत्र में अनबन हो गई और श्याम सुंदर गुस्से में घर छोड़कर चला गया। शुरुआत में लगा कि वह थोड़ी देर में लौट आएगा, लेकिन वह कभी वापस नहीं आया।
विज्ञापन छपवाए, पोस्टर लगवाए, पर नहीं मिला कोई सुराग
बेटे के अचानक गायब हो जाने से भरत व्यास के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने अपने लाडले को ढूंढने के लिए हर संभव कोशिश की। अखबारों में विज्ञापन दिए गए, दीवारों पर पोस्टर लगवाए गए और यहाँ तक कि देश के कोने-कोने में उसकी तलाश की गई। पीड़ित पिता ने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च— हर चौखट पर माथा टेका और मन्नतें मांगी, लेकिन श्याम सुंदर का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। बेटे के बिछड़ने का गम भरत व्यास को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। वह धीरे-धीरे गहरे डिप्रेशन और एक अजीब से अपराधबोध (Guilt) में डूबने लगे।
जब टूटे दिल के साथ प्रोड्यूसर के कहने पर मजबूरी में उठाया पेन
बेटे के जाने के बाद भरत व्यास पूरी तरह गुमसुम रहने लगे थे और उनका काम से पूरी तरह मन हट चुका था। इसी दौरान एक फिल्म प्रोड्यूसर उनके पास गाना लिखवाने की फरमाइश लेकर आया। मानसिक तनाव से गुजर रहे भरत व्यास ने गुस्से में गाना लिखने से साफ मना कर दिया। तब उनकी पत्नी ने निर्माता की परेशानी को समझा और भरत जी को समझाया कि काम में मन लगाने से शायद उनका दुख थोड़ा कम हो सके। पत्नी के समझाने पर वह आखिरकार लिखने के लिए राजी हो गए।
ऐसे हुआ 'जरा सामने तो आओ छलिये' और 'आ लौट के आजा मेरे मीत' का जन्म
साल 1957 की ब्लॉकबस्टर म्यूजिकल हिट फिल्म 'जनम जनम के फेरे' के लिए जब भरत व्यास ने पेन उठाया, तो पन्नों पर उनके दिल का गुबार और बेटे के खोने की तड़प शब्दों के रूप में बह निकली। उन्होंने लिखा— 'जरा सामने तो आओ छलिये, छुप-छुप छलने में क्या राज है...'। यहाँ 'छलिया' शब्द उन्होंने भगवान के लिए नहीं, बल्कि अपने उस बेटे के लिए इस्तेमाल किया था जो उन्हें इस तरह तड़पता छोड़ गया था। इसी तरह फिल्म 'रानी रूपमती' का मशहूर गाना 'आ लौट के आजा मेरे मीत...' भी उन्होंने अपने बेटे को वापस बुलाने की गुहार लगाते हुए लिखा था।
लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसी महान आवाजों में सजे इन गानों ने रिलीज होते ही रेडियो और लोगों के दिलों पर राज करना शुरू कर दिया। दुनिया इसे प्यार का नगमा समझकर गुनगुनाती रही, लेकिन बदकिस्मती देखिए कि देश भर में गूंजने वाले इस गाने को सुनने के बाद भी उनका बेटा कभी लौटकर वापस नहीं आया। एक पिता की कलम से निकला यह दर्द आज भी भारतीय संगीत इतिहास की सबसे भावुक दास्तानों में से एक है।