क्या डायबिटीज की हर रोज की देखरेख से आप भी महसूस करने लगे हैं मानसिक थकान
मधुमेह यानी डायबिटीज एक ऐसी स्वास्थ्य स्थिति है जिसके साथ जीना किसी लंबी रेस जैसा है, जिसमें एक भी दिन आराम करने या लापरवाही बरतने की कोई गुंजाइश नहीं होती। रोज सुबह उठकर खाली पेट ब्लड शुगर की जांच करना, दवाइयों का समय पर सेवन करना, इंसुलिन के डोज लेना, खाने-पीने की हर एक चीज में कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट का हिसाब लगाना और लगातार इस बात का डर सताते रहना कि कहीं शुगर लेवल बढ़ या घट न जाए, किसी भी इंसान के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत भारी पड़ सकता है। जब कोई मरीज लगातार महीनों और सालों तक इस तरह के सख्त और अनुशासित रूटीन का पालन करते-करते अंदर से पूरी तरह थक जाता है और उसका अपनी बीमारी से लड़ने का हौसला टूटने लगता है, तो चिकित्सा और स्वास्थ्य विज्ञान की भाषा में इस मानसिक स्थिति को 'डायबिटीज बर्नआउट' (Diabetes Burnout) कहा जाता है। यह कोई शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि यह लंबे समय तक रहने वाले क्रॉनिक स्ट्रेस, निराशा और उस भावनात्मक थकावट का परिणाम है जो हर समय खुद को स्वस्थ रखने के दबाव के कारण पैदा होती है।
क्या होते हैं डायबिटीज बर्नआउट के मुख्य लक्षण और क्यों होती है यह समस्या?
डायबिटीज बर्नआउट के शिकार होने वाले मरीज अक्सर अपनी बीमारी को लेकर पूरी तरह लापरवाह हो जाते हैं, जिसे देखकर उनके परिवार वाले या डॉक्टर हैरान रह जाते हैं। इसके लक्षणों में अचानक से ब्लड शुगर की नियमित जांच करना बंद कर देना, डॉक्टर के पास फॉलोअप के लिए जाने से कतराना, दवाइयां समय पर न खाना, अपने खान-पीने के नियमों को पूरी तरह तोड़ देना और अपने स्वास्थ्य के प्रति एक गहरी उदासीनता या निराशा की भावना पैदा हो जाना शामिल है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लगातार परफेक्शन के साथ डायबिटीज को कंट्रोल करने की कोशिश करते-करते मरीज का मानसिक तंत्र जवाब दे जाता है। जब उसे यह महसूस होता है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कभी-कभी शुगर लेवल ऊपर-नीचे हो ही जाता है, तो उसके मन में यह विचार आने लगता है कि इतनी मेहनत करने का आखिर क्या फायदा? यह नकारात्मक सोच धीरे-धीरे उसे डिप्रेशन और गंभीर मानसिक तनाव की तरफ धकेल देती है, जिससे उसकी शारीरिक स्थिति और अधिक खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।
इस मानसिक थकान और निराशा से बाहर निकलने के लिए अपनाएं ये असरदार उपाय
यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य भी इस प्रकार के डायबिटीज बर्नआउट से गुजर रहा है, तो खुद को या उन्हें कोसने के बजाय इस स्थिति को एक मेडिकल और मनोवैज्ञानिक चुनौती के रूप में स्वीकार करना बेहद जरूरी है। सबसे पहले, अपने डॉक्टर या किसी पेशेवर काउंसलर से खुलकर बात करें और अपनी इस मानसिक थकान के बारे में चर्चा करें, क्योंकि कभी-कभी रूटीन में थोड़ा लचीलापन लाना बहुत जरूरी होता है। अपने डॉक्टर की सलाह से अपने ब्लड शुगर मॉनिटरिंग के तरीकों को थोड़ा सरल बनाएं और खुद पर हर समय सौ प्रतिशत परफेक्ट रहने का दबाव बिल्कुल न डालें। इसके अलावा, अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों का सहयोग लें ताकि वे आपकी इस भावनात्मक यात्रा में आपका संबल बन सकें और आपको अकेलापन महसूस न हो। थोड़ी बहुत शारीरिक गतिविधि, योग, ध्यान और अपनी पसंद के अन्य कामों में थोड़ा समय बिताना भी आपके मानसिक स्वास्थ्य को तरोताजा करने में बहुत मदद कर सकता है।
सकारात्मक सोच और छोटी-छोटी सफलताओं का जश्न मनाकर करें डायबिटीज का सामना
यह हमेशा याद रखना जरूरी है कि डायबिटीज के साथ जीना एक मैराथन की तरह है, कोई सौ मीटर की दौड़ नहीं है, इसलिए इसमें गति से ज्यादा निरंतरता और मानसिक शांति का होना सबसे ज्यादा मायने रखता है। यदि किसी दिन आपका ब्लड शुगर लेवल थोड़ा ऊपर-नीचे हो भी जाता है, तो इसके लिए खुद को अपराधी न मानें और न ही निराश हों, बल्कि अगली सुबह एक नई शुरुआत के साथ फिर से अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। अपने डॉक्टर के साथ मिलकर एक ऐसा व्यावहारिक और टिकाऊ लाइफस्टाइल प्लान तैयार करें जिसे बिना किसी मानसिक तनाव के आसानी से लंबे समय तक निभाया जा सके। जब आप अपनी बीमारी को एक बोझ के रूप में देखने के बजाय अपने शरीर की एक सामान्य जरूरत के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, तो यह मानसिक थकान अपने आप कम होने लगती है। सकारात्मक सोच, अपनों का प्यार और थोड़ा सा आत्म-संयम आपको इस 'डायबिटीज बर्नआउट' के चक्रव्यूह से बाहर निकालकर एक खुशहाल और स्वस्थ जीवन जीने की नई ताकत देगा।