स्ट्रोक के बाद क्यों चली जाती है हाथ-पैर की ताकत और शरीर का संतुलन
आधुनिक जीवनशैली, तनाव और खानपान की गड़बड़ी के चलते स्वास्थ्य से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं तेजी से पैर पसार रही हैं, जिनमें मस्तिष्क से जुड़ा 'ब्रेन स्ट्रोक' (Brain Stroke) सबसे खतरनाक और जानलेवा बीमारियों में से एक माना जाता है। जब किसी व्यक्ति को स्ट्रोक आता है, तो अक्सर उसके शरीर का एक हिस्सा सुन्न पड़ जाता है या फिर हाथ-पैर पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं। मरीजों और उनके परिजनों के मन में यह सवाल सबसे पहले आता है कि आखिर अचानक ऐसा क्या होता है कि मस्तिष्क के दौरे के बाद शरीर के अंगों की ताकत और उनकी हरकत पूरी तरह छिन जाती है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, स्ट्रोक का सीधा संबंध हमारे दिमाग की उन रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) से होता है जो मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों को ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाती हैं। जब इन नसों में रुकावट आती है या वे फट जाती हैं, तो मस्तिष्क का वह हिस्सा काम करना बंद कर देता है जो हमारे शरीर की मांसपेशियों की गतिविधियों (Motor Functions) को नियंत्रित करता है। इस स्थिति से उबरने और खोई हुई ताकत को वापस पाने के लिए न्यूरोलॉजिकल फिजियोथेरेपी (Neurological Physiotherapy) को सबसे बड़ा वरदान माना गया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि स्ट्रोक के बाद शरीर की ताकत क्यों चली जाती है और इस विकट परिस्थिति से बाहर निकलने में फिजियोथेरेपी किस प्रकार एक संजीवनी का काम करती है।
जानिए मस्तिष्क की नसों में आने वाले अवरोध और मोटर कॉर्टेक्स डैमेज का पूरा मेडिकल विज्ञान
हमारे शरीर का हर एक अंग, चाहे वह हाथ हिलाना हो, पैर से चलना हो या उंगलियों से किसी वस्तु को पकड़ना हो, मस्तिष्क के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) द्वारा नियंत्रित होता है। मस्तिष्क में एक विशेष क्षेत्र होता है जिसे 'मोटर कॉर्टेक्स' (Motor Cortex) कहा जाता है, जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों को संदेश भेजने का काम करता है। जब किसी व्यक्ति को इस्केमिक स्ट्रोक (मस्तिष्क में खून का थक्का जमना) या हेमरेजिक स्ट्रोक (नसों का फटना) का झटका लगता है, तो ब्रेन के उस हिस्से की कोशिकाएं (Neurons) ऑक्सीजन की कमी के कारण मरने लगती हैं। जब मोटर कॉर्टेक्स या उससे जुड़ी नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो दिमाग और मांसपेशियों के बीच का सिग्नल आदान-प्रदान करने वाला नेटवर्क टूट जाता है। यही मुख्य कारण है कि मरीज के हाथ और पैर अचानक बेजान हो जाते हैं, उनमें सुन्नपन आ जाता है या वे पक्षाघात (Paralysis/Hemiplegia) का शिकार हो जाते हैं। स्ट्रोक के तुरंत बाद के पहले कुछ हफ्ते मरीज के जीवन के सबसे संवेदनशील और निर्णायक होते हैं, क्योंकि इस दौरान यदि सही मेडिकल और रिहैबिलिटेशन केयर मिल जाए, तो शरीर के अंगों में दोबारा जान फूंकी जा सकती है।
स्ट्रोक के मरीजों के लिए फिजियोथेरेपी क्यों है सबसे जरूरी, जानिए न्यूरो-प्लास्टिसिटी का अद्भुत रहस्य
जब किसी मरीज को स्ट्रोक के बाद लकवा मार जाता है, तो परिवार के लोग अक्सर यह सोचते हैं कि अब यह अंग कभी ठीक नहीं हो पाएगा। लेकिन मेडिकल साइंस और आधुनिक फिजियोथेरेपी इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित करती है। फिजियोथेरेपी की महत्ता को समझने के लिए 'न्यूरो-प्लास्टिसिटी' (Neuroplasticity) के सिद्धांत को समझना बेहद जरूरी है। न्यूरोप्लास्टिसिटी हमारे मस्तिष्क की वह अद्भुत और प्राकृतिक क्षमता है जिसके तहत दिमाग का स्वस्थ हिस्सा क्षतिग्रस्त हिस्से के कार्यों को अपने हाथ में लेना सीख जाता है। जब एक कुशल न्यूरो-फिजियोथेरेपिस्ट मरीज के साथ विशेष प्रकार के मूवमेंट, बैलेंसिंग एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग और मोटर री-लर्निंग प्रोग्राम शुरू करता है, तो मस्तिष्क के न्यूरॉन्स नए रास्ते तलाशने लगते हैं। लगातार अभ्यास और रिहैबिलिटेशन से मांसपेशियों की रुकी हुई गतिविधियां फिर से सक्रिय होने लगती हैं, जिससे मरीज धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा होना और हाथों से काम करना सीख जाता है।
स्ट्रोक रिकवरी के दौरान किन बातों का रखना चाहिए विशेष ध्यान और फिजियोथेरेपी के चरण
स्ट्रोक के बाद की रिकवरी एक लंबी और धैर्य की मांग करने वाली प्रक्रिया है, जिसमें मरीज की इच्छाशक्ति और परिवार का मानसिक समर्थन सबसे बड़ी ताकत बनता है। फिजियोथेरेपी सत्रों की शुरुआत आमतौर पर बिस्तर पर लेटे-लेटे जोड़ों को मोड़ने (Passive Range of Motion Exercises) से होती है, ताकि मांसपेशियों में अकड़न (Spasticity) न आए। जैसे-जैसे मरीज की स्थिति में सुधार होता है, वैसे-वैसे उसे बैठने, खड़े होने और सपोर्ट के साथ चलने का अभ्यास कराया जाता है। इसके साथ ही हाइड्रोथेरेपी, रोबोटिक असिस्टेड रिहैबिलिटेशन और बैलेंस ट्रेनिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग किया जाने लगा है। यदि आपके परिवार में या किसी जानने वाले के साथ ऐसी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी है, तो कभी भी उम्मीद न छोड़ें और डॉक्टर की सलाह पर तुरंत एक अच्छे फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में रिहैबिलिटेशन शुरू करवाएं। सही समय पर शुरू की गई फिजियोथेरेपी न केवल मरीज को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करती है, बल्कि उसे एक आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने का दूसरा मौका भी देती है।