चाईबासा के तीरंदाज विजय सुंडी ने जापान में रचा इतिहास, पैरा एशियाई खेलों में जीता गोल्ड मेडल

चाईबासा के तीरंदाज विजय सुंडी ने जापान में रचा इतिहास, पैरा एशियाई खेलों में जीता गोल्ड मेडल

भारतीय खेल जगत के इतिहास में झारखंड के वीर सपूतों ने समय-समय पर अपनी असाधारण मेहनत और अदम्य साहस के बल पर देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है। इसी कड़ी में राज्य के सुदूर और आदिवासी बहुल क्षेत्र चाईबासा से एक ऐसी प्रेरणादायक और गौरवशाली खबर सामने आई है, जिसने पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। जापान की धरती पर आयोजित हुए प्रतिष्ठित पैरा एशियाई खेलों (Asian Para Games) में चाईबासा के माटी के लाल और अंतरराष्ट्रीय पैरा तीरंदाज विजय सुंडी (Vijay Sundi) ने अपने अचूक निशाने का जादू बिखेरते हुए स्वर्ण पदक (Gold Medal) अपने नाम कर लिया है। जब जापान के खेल परिसर में भारत का तिरंगा झंडा सबसे ऊपर फहराया गया और राष्ट्रगान की धुन गूंजी, तो विजय सुंडी की आंखें नम थीं और देश भर के खेल प्रेमियों का दिल गर्व से भर उठा। विपरीत परिस्थितियों, संसाधनों की भारी कमी और शारीरिक चुनौतियों को मात देकर वैश्विक मंच पर स्वर्ण जीतने तक का यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जो देश के करोड़ों युवाओं को यह सिखाता है कि यदि आपके भीतर जज्बा हो, तो दुनिया की कोई भी बाधा आपको आपके लक्ष्य तक पहुंचने से रोक नहीं सकती।

अभावों और संघर्षों से भरा बचपन, चाईबासा की गलियों से जापान के पोडियम तक का सफर

झारखंड के कोल्हान प्रमंडल के अंतर्गत आने वाले चाईबासा जिले के एक साधारण परिवार में जन्मे विजय सुंडी का शुरुआती जीवन तमाम आर्थिक तंगियों और संघर्षों के बीच बीता। शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के कारण उन्हें बचपन से ही जीवन के हर कदम पर सामान्य बच्चों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन विजय के भीतर का जज्बा और खेल के प्रति उनका अटूट प्रेम इन सारी बाधाओं से बहुत बड़ा था। जब उन्होंने पहली बार हाथ में धनुष और बाण थामा, तो उन्हें यह भी नहीं पता था कि आने वाले समय में वे इसी तीरंदाजी के बल पर न सिर्फ अपने परिवार का बल्कि पूरे देश का नाम इतिहास के पन्नों में अमर कर देंगे। स्थानीय कोचों ने जब उनकी एकाग्रता और कंधे की ताकत को देखा, तो उन्हें तराशना शुरू किया। चाईबासा के धूल भरे मैदानों से लेकर राज्य स्तर के कैंपों तक, विजय ने कभी भी अपनी शारीरिक अक्षता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर लगातार आगे बढ़ते चले गए।

पैरा एशियाई खेलों में विजय सुंडी का अचूक निशाना और फाइनल की रोमांचक जंग

जापान में आयोजित इस महाद्वीपीय पैरा खेल प्रतियोगिता में दुनिया भर के सबसे बेहतरीन और खूंखार तीरंदाज अपनी किस्मत आजमाने के लिए उतरे थे। दबाव के इस पल में विजय सुंडी ने मानसिक रूप से गजब का संतुलन और धैर्य दिखाया। तीरंदाजी के फाइनल मुकाबले में उनका सामना एशिया के दिग्गजों से था, जहाँ एक-एक तीर पर पदक का रंग बदल रहा था। भारतीय तीरंदाज ने अपनी पूरी एकाग्रता के साथ अपने ट्रेडमार्क अंदाज में एक के बाद एक सटीक निशाने साधे और प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए स्कोरबोर्ड में अपनी बढ़त मजबूत कर ली। अंतिम और निर्णायक चरणों में जब मुकाबला बेहद रोमांचक मोड़ पर था, तब विजय के तीरों ने सीधे दस अंकों के निशान पर प्रहार किया और इसी के साथ उन्होंने स्वर्ण पदक पर अपना ऐतिहासिक कब्जा जमा लिया। उनकी इस शानदार जीत ने साबित कर दिया कि भारतीय पैरा एथलीट्स अब दुनिया में किसी से भी पीछे नहीं हैं और वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा बुलंद करने का दम रखते हैं।

झारखंड और देश भर में जश्न का माहौल, खेल प्रेमियों और दिग्गजों ने दी बधाइयाँ

विजय सुंडी के इस ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतने की खबर जैसे ही उनके गृह जिले चाईबासा और झारखंड की राजधानी रांची तक पहुँची, वहाँ दीवाली और होली जैसा जश्न शुरू हो गया। उनके पैतृक गांव और स्थानीय खेल अकादमियों में लोग ढोल-नगाड़ों के साथ सड़कों पर उतर आए और एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर अपनी खुशी का इजहार किया। झारखंड सरकार के खेल मंत्रियों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और देश के कई बड़े खेल दिग्गजों ने सोशल मीडिया और आधिकारिक बयानों के जरिए विजय सुंडी को इस अभूतपूर्व सफलता पर हार्दिक बधाइयाँ दी हैं। हर कोई इस बात की चर्चा कर रहा है कि कैसे बिना किसी बड़े कॉर्पोरेट सपोर्ट या आधुनिक सुविधाओं के, केवल अपनी कड़ी मेहनत और जिजीविषा के बल पर चाईबासा के इस बेटे ने जापान में जाकर भारत का परचम लहरा दिया है। यह जीत न सिर्फ विजय के व्यक्तिगत जीवन में एक नया सवेरा लेकर आई है, बल्कि देश के उन तमाम दिव्यांग युवाओं के लिए एक नई उम्मीद की किरण बन गई है जो खेलों में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।

आने वाले पैरालंपिक खेलों के लिए नई उम्मीद और युवाओं के लिए एक प्रेरणा

जापान के पैरा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक का यह तमगा हासिल करने के बाद अब विजय सुंडी के कदम यहीं रुकने वाले नहीं हैं। उनका अगला और सबसे बड़ा लक्ष्य आगामी पैरालंपिक खेलों (Paralympics) में देश के लिए पोडियम फिनिश करना और स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास को दोहराना है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विजय को इसी प्रकार का प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और आधुनिक उपकरण मिलते रहे, तो वे आने वाले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भारत के सबसे बड़े पदकवीरों में शुमार हो जाएंगे। उनकी यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि भारत में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, बस जरूरत है उन्हें सही समय पर सही मंच और प्रोत्साहन प्रदान करने की। चाईबासा के आदिवासी आंचल से निकलकर जापान के आसमान पर अपनी सफलता का झंडा गाड़ने वाले विजय सुंडी आज हर उस भारतीय के लिए एक जीवंत मिसाल बन चुके हैं जो सपनों को सच करने की हिम्मत रखता है।