झारखंड के खजाने में महाघोटाला; 18,060 करोड़ रुपये का कोई हिसाब नहीं, 5 साल में दोगुना हुआ गड़बड़ियों का पहाड़
झारखंड के सरकारी खजाने में वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। विभागों में अंकेक्षण आपत्तियों (ऑडिट ऑब्जेक्शन) और लंबित वित्तीय गड़बड़ियों का पहाड़ घटने के बजाय साल-दर-साल तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2021-22 से 2025-26 के पांच वर्षों के भीतर ही यह लंबित आंकड़ा उछलकर 18,060 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है।
इस भारी-भरकम राशि में सरकारी धन का सीधा गबन, वित्तीय नियमों का खुला दुरुपयोग, सरकारी खजाने में जमा न कराई गई राशियां, वसूली योग्य बकाये और वर्षों से असमायोजित पड़ा अग्रिम (एडवांस) शामिल है। राज्य के विभिन्न महकमों द्वारा इतनी विशाल धनराशि का विधिवत हिसाब न देना सीधे तौर पर सिस्टम की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है।
पांच साल में दोगुनी हुई अनियमितता की रकम
हैरानी की बात यह है कि पिछले दो दशकों के मुकाबले हाल के पांच वर्षों में यह आंकड़ा लगभग दोगुना हो गया। वर्ष 2001 से 2022-23 तक के 22 वर्षों के लंबे सफर में लंबित वित्तीय मामलों का कुल योग 9,737 करोड़ रुपये था। इस पुराने रिकॉर्ड पर 5 अक्तूबर 2023 को तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव ने उच्चस्तरीय समीक्षा कर गहरी चिंता जताई थी। उस दौरान मार्च 2024 तक इन मामलों में 50 फीसदी तक की कटौती करने की सख्त डेडलाइन तय की गई थी। साथ ही वित्तीय प्रणाली में बुनियादी सुधार के लिए बिहार की तर्ज पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष निगरानी कमेटी बनाने का खाका खींचा गया था। हालांकि, जमीनी स्तर पर न तो फाइलों का निपटारा हुआ और न ही लक्ष्य पूरे किए जा सके, जिसका नतीजा यह हुआ कि बकाया मामलों का बोझ 18 हजार करोड़ के पार चला गया।
22 वर्षों के बकाये में 8,330 करोड़ की सिर्फ ऑडिट आपत्तियां
पुराने आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 2001 से 2023 तक के 9,737 करोड़ के बकाये में 63.57 करोड़ रुपये का सीधा गबन और 180 करोड़ रुपये का वित्तीय दुरुपयोग दर्ज था। वहीं 688 करोड़ रुपये वसूली योग्य राशि के रूप में चिन्हित थे, जबकि अधिकारियों और एजेंसियों को बांटे गए 476 करोड़ रुपये के अग्रिम का समायोजन ही नहीं हुआ था। इसके अलावा 8,330 करोड़ रुपये की भारी रकम केवल अंकेक्षण आपत्तियों की फेहरिस्त में अटकी रह गई थी, जिस पर विभागों ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया।
राजस्व, स्वास्थ्य और पथ निर्माण में सबसे ज्यादा छेद
वित्तीय समीक्षाओं में जिन विभागों की कार्यशैली सबसे ज्यादा संदिग्ध पाई गई, उनमें राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार, स्वास्थ्य, पथ निर्माण और कृषि विभाग सबसे आगे रहे। इसके अलावा स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता, उच्च शिक्षा, ग्रामीण विकास, नगर विकास, जल संसाधन, खान एवं भूतत्व और परिवहन विभाग में भी अरबों रुपये के खर्च का मिलान नहीं हो सका है। छोटे भौगोलिक दायरे और सीमित राजस्व स्रोत वाले राज्य में इतनी बड़ी रकम का ऑडिट में फंसना राज्य के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
अब 22 अक्तूबर को आमने-सामने होंगे वित्त मंत्री और विभागीय सचिव
लगातार बिगड़ते इस वित्तीय गणित को दुरुस्त करने के लिए वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने आगामी 22 अक्तूबर को सभी प्रमुख विभागों के सचिवों की एक अनिवार्य बैठक बुलाई है। इससे पहले तय की गईं दो बैठकें अपरिहार्य कारणों से टल चुकी थीं, लेकिन अब सरकार वित्तीय अनुशासनहीनता पर लगाम कसने के लिए कड़े प्रशासनिक फैसलों की तैयारी में है। बैठक में सचिवों से लंबित ऑडिट आपत्तियों के त्वरित निस्तारण, गबन की रिकवरी और असमायोजित अग्रिम की एक-एक पाई का हिसाब मांगा जाएगा।