पलामू की प्यास बुझाने वाली नदियां बन रहीं 'जहर', सुप्रीम कोर्ट के एक्शन के बाद जागी सरकार

पलामू की प्यास बुझाने वाली नदियां बन रहीं 'जहर', सुप्रीम कोर्ट के एक्शन के बाद जागी सरकार

झारखंड के पलामू जिले की लाइफलाइन मानी जाने वाली नदियों को स्वच्छ और प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर बड़ी कवायद शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के अनुपालन में जिला प्रशासन उत्तरी कोयल, सोन, अमानत, बटाने, औरंगा और भेलवा नदी की मौजूदा स्थिति का व्यापक सर्वे कर रहा है। जमीनी हकीकत को समेटती यह विस्तृत रिपोर्ट राज्य सरकार के जरिए केंद्र सरकार को भेजी जाएगी, ताकि इन नदियों के पुनरुद्धार के लिए ठोस बजट और योजनाओं को धरातल पर उतारा जा सके।

प्रशासनिक स्तर पर इस मुहिम की शुरुआत गांधी जयंती के मौके पर कोयल और अमानत नदी के संगम स्थल से की गई, जहां व्यापक सफाई अभियान के साथ पौधारोपण किया गया। अधिकारियों की टीमें अब नदियों में सीधे गिरने वाले गंदे नालों, सीवेज और औद्योगिक कचरे के मुहानों को चिह्नित कर रही हैं। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स के कड़े अनुपालन के तहत मेदिनीनगर नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों में अत्याधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाने की प्रक्रिया तेज की जा रही है, जिससे शहरों का गंदा पानी शोधन के बाद ही आगे बढ़े।

पलामू के उपायुक्त दिलीप प्रताप सिंह शेखावत के अनुसार, भोपाल म्युनिसिपल कॉरपोरेशन से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के आए निर्देशों के आधार पर जिले की सभी प्रमुख नदियों की सटीक स्थिति की रिपोर्ट मांगी गई है। डीसी ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट तैयार करने के साथ-साथ कचरा प्रबंधन के नियमों का उल्लंघन करने वालों और नदी तटों को दूषित करने वाले तत्वों के खिलाफ सीधी कानूनी कार्रवाई का मसौदा भी तैयार किया जा रहा है, ताकि आने वाले समय में सख्त कदम उठाए जा सकें।

पलामू की करीब 15 से 20 लाख आबादी की दैनिक और कृषि जरूरतें इन्हीं जलस्रोतों पर टिकी हैं, लेकिन लंबे समय से अनियोजित शहरीकरण इनके लिए संकट बना हुआ है। मेदिनीनगर और रेहला क्षेत्र का अपशिष्ट कोयल नदी को नुकसान पहुंचा रहा है, तो वहीं हुसैनाबाद का कचरा सोन नदी और बिश्रामपुर का गंदा पानी भेलवा नदी के प्रवाह को जहरीला बना रहा है। गुमला से निकलकर 100 किमी तक पलामू में बहने वाली उत्तरी कोयल, हैदरनगर की प्यास बुझाने वाली सोन और पांकी-पाटन से गुजरने वाली 210 किमी लंबी अमानत नदी के किनारों पर बढ़ता अतिक्रमण भी बड़ी समस्या है। पर्यावरणविद् कौशल किशोर जायसवाल और स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन के इस कदम का स्वागत करते हुए साफ कहा है कि जब तक जनभागीदारी नहीं जुड़ेगी और सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था जमीन पर शुरू नहीं होगी, तब तक नदियों को अविरल बनाना चुनौतीपूर्ण रहेगा।