रूपी सोरेन की हालत नाजुक, याद आया वो किस्सा जब हसुआ लेकर महाजन को दौड़ाया
झारखंड की राजनीति के शिखर पुरुष और दिशोम गुरु शिबू सोरेन (Shibu Soren) की अर्धांगिनी तथा वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (Hemant Soren) की माता रूपी सोरेन (Rupi Soren) की स्वास्थ्य स्थिति इस समय बेहद नाजुक बनी हुई है और रांची के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है। इस बीच, झारखंड के राजनीतिक गलियारों और आदिवासी समाज के बीच रूपी सोरेन के संघर्षपूर्ण जीवन, उनके अदम्य साहस और अतीत के उन पन्नों की चर्चा एक बार फिर से तेज हो गई है, जिन्हें आज की पीढ़ी शायद ही जानती हो। झारखंड आंदोलन और महाजनों के खिलाफ जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के शुरुआती दौर में जब शिबू सोरेन आदिवासियों के अधिकारों के लिए आंदोलन की नींव रख रहे थे, तब रूपी सोरेन ने केवल एक पत्नी या मां की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वे इस महासंग्राम की एक ऐसी साहसी योद्धा थीं जिन्होंने अन्याय के खिलाफ अकेले दम पर तलवार और हसुआ उठा लिया था। उनके जीवन से जुड़ा वह रोमहंस आज भी झारखंड के गांवों में लोककथाओं की तरह सुना जाता है, जब उन्होंने महाजन के अत्याचार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका था और गुरुजी को ढूंढने के लिए जान की बाजी लगाकर घने जंगलों में निकल पड़ी थीं। आइए विस्तार से जानते हैं रूपी सोरेन के जीवन के उस अनसुने और साहसिक अध्याय के बारे में जो झारखंड के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
जब रूपी सोरेन ने हसुआ उठाकर महाजन के चंगुल से छुड़ाए थे गरीब आदिवासी: झारखंड के शुरुआती संघर्ष के वे दिन
संथाल परगना और झारखंड के कोयलांचल क्षेत्रों में आज से कई दशक पहले महाजनों और साहूकारों का ऐसा आतंक हुआ करता था कि गरीब आदिवासी अपनी फसल, मवेशी और जमीन कौड़ियों के भाव उनके यहां गिरवी रखने को मजबूर थे। शिबू सोरेन जब इन महाजनों के खिलाफ 'महाजनी प्रथा' के अंत का बिगुल फूंक रहे थे, तब उनके परिवार को भूखे रहने और अनगिनत खतरों का सामना करना पड़ता था। एक बार जब एक क्रूर महाजन जबरन सोरेन परिवार और गांव के गरीबों की फसल लूटने उनके घर आ धमका और रूपी सोरेन व उनके छोटे बच्चों को अपमानित करने की कोशिश की, तो रूपी सोरेन ने घबराने के बजाय घर में रखा कृषि कार्य का हथियार यानी 'हसुआ' उठा लिया और अकेले ही उस महाजन को अपनी जान बचाकर भागने पर मजबूर कर दिया। उस वाकये ने आसपास के पूरे इलाके में यह साबित कर दिया था कि शिबू सोरेन की अर्धांगिनी न केवल धीर-गंभीर हैं, बल्कि अन्याय के आगे सीना तानकर खड़े होने का हौसला भी रखती हैं।
जब गुरुजी को ढूंढने के लिए आधी रात को घने जंगलों में निकल पड़ी थीं रूपी सोरेन: आदिवासियों की दुर्गा का रूप
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के शुरुआती आंदोलन के दिनों में शिबू सोरेन यानी 'गुरुजी' को पकड़ने के लिए पुलिस और सामंतवादी ताकतों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा था। कई-कई दिनों तक गुरुजी का कोई अता-पता नहीं रहता था, वे भूमिगत रहकर आदिवासियों को संगठित करते थे। ऐसे ही एक खौफनाक दौर में जब कई दिनों तक गुरुजी घर नहीं लौटे और यह अफवाह फैल गई कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है या जंगल में उन पर हमला हुआ है, तब रूपी सोरेन ने हार नहीं मानी। अपनी छाती पर पत्थर रखकर उन्होंने अपने छोटे-छोटे बच्चों को घर पर छोड़ा और आधी रात के सन्नाटे में हाथ में एक लालटेन और लाठी लेकर अकेले ही झारखंड के अनजाने, खूंखार और घने जंगलों में गुरुजी की तलाश में निकल पड़ीं। मीलों पैदल चलकर, जंगली जानवरों और पुलिस की गश्त के बीच उन्होंने जंगलों की खाक छान डाली और आखिरकार अपने पति को खोजकर सुरक्षित बाहर लाईं। उनके इस असीम साहस को देखकर उस समय के तमाम आदिवासी क्रांतिकारी उन्हें 'झारखंड की दुर्गा' कहकर पुकारने लगे थे।
रूपी सोरेन का त्याग और सादगी भरा जीवन: आज भी सादगी की मिसाल है सोरेन परिवार की यह माटी से जुड़ी मां
दिशोम गुरु शिबू सोरेन के मुख्यमंत्री बनने और उनके बेटे हेमंत सोरेन के झारखंड की सत्ता संभालने के बाद भी रूपी सोरेन ने कभी चकाचौंध और आधुनिक सुख-सुविधाओं की दुनिया को नहीं अपनाया। वे हमेशा अपनी पैतृक जड़ों, नेमरा गांव की माटी, अपनी संस्कृति और बेहद साधारण आदिवासी जीवनशैली से जुड़ी रहीं। जब भी वे रांची या अपने गांव में होती हैं, तो उनका स्नेह और आत्मीयता हर आम कार्यकर्ता और मिलने वाले के लिए खुला रहता है। आज जब उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी है और वे अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही हैं, तो झारखंड का बच्चा-बच्चा, झामुमो कार्यकर्ता और राज्य का आम नागरिक उनकी लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है। इतिहास के वे पन्ने गवाह हैं कि जिस महिला ने अपनी जवानी में लाठियां, गोलियां और महाजनों के जुल्म झेले हों, वह इस स्वास्थ्य संकट से भी निश्चित रूप से विजयी होकर लौटेगी, ऐसा पूरे राज्य का अटूट विश्वास है।