देश के टॉप आईआईटी संस्थानों में पिछले 20 सालों में 115 छात्रों की मौत

देश के टॉप आईआईटी संस्थानों में पिछले 20 सालों में 115 छात्रों की मौत

भारत के तकनीकी शिक्षा तंत्र में अपनी एक खास और सर्वोच्च पहचान रखने वाले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों यानी आईआईटी (IITs) से हाल ही में सामने आए आंकड़े देश के हर जागरूक नागरिक, अभिभावक और शिक्षाविदों की रूह कपकपा देने के लिए काफी हैं। हालिया आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, देश के विभिन्न आईआईटी परिसरों में पिछले लगभग 20 वर्षों के भीतर 115 से अधिक मेधावी छात्र-छात्राओं की अकाल मृत्यु हो चुकी है। इन आंकड़ों में से अधिकांश मौतें आत्महत्या, अत्यधिक मानसिक दबाव और कैंपस के भीतर की गंभीर परिस्थितियों के कारण हुई हैं। एक तरफ जहां देश भर के करोड़ों युवा और उनके माता-पिता इन प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, वहीं दूसरी तरफ इन परिसरों के भीतर पनप रहा मौन संकट और विद्यार्थियों में बढ़ता डिप्रेशन इस बात की गवाही देता है कि चमक-धमक और शानदार पैकेज के पीछे एक बहुत ही दर्दनाक और अंधेरी सच्चाई भी छुपी हुई है। आखिर क्या वजह है कि देश के सबसे तेज दिमाग वाले और चुनिंदा युवा अपनी जवानी के शुरुआती पड़ाव पर ही जिंदगी की जंग हार जा रहे हैं? इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर गहराई से विचार करने और प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि हमारे देश का भविष्य इस तरह असमय न बुझे।

अकादमिक दबाव और परफेक्शन की अंधी दौड़ का बढ़ता बोझ

आईआईटी संस्थानों में प्रवेश मिलना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है, जिसके लिए छात्र छठी या सातवीं कक्षा से ही कोचिंग की कठिन चक्की में पीसना शुरू कर देते हैं। लेकिन असली संघर्ष कैंपस के अंदर कदम रखने के बाद शुरू होता है। जब ये छात्र देश भर के सबसे प्रतिभाशाली बच्चों के बीच पहुंचते हैं, तो वहां का सेमेस्टर सिस्टम, लगातार होने वाली परीक्षाएं, ग्रेड्स की अंधी दौड़ और हमेशा अव्वल आने का भारी दबाव उनके कोमल मन पर हावी होने लगता है। स्कूल के स्तर पर हमेशा टॉपर रहने वाले छात्र जब कॉलेज में औसत प्रदर्शन करने लगते हैं, तो वे इस मानसिक झटके को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। शिक्षकों की ऊंची उम्मीदें, माता-पिता की आकांक्षाओं का बोझ और खुद को साबित करने की होड़ उन्हें अंदर ही अंदर दीमक की तरह खोखला कर देती है। कई बार वे अपने इस तनाव को किसी के साथ साझा भी नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें डर होता है कि लोग उन्हें कमजोर या असफल मान लेंगे। यही घुटन धीरे-धीरे उन्हें गहरी निराशा और मानसिक अवसाद की गर्त में धकेल देती है, जहां से कई बार वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता।

कैंपस का कठोर माहौल, अकेलापन और सोशल आइसोलेशन

आईआईटी के बड़े-बड़े और आधुनिक परिसरों में बुनियादी सुविधाओं की कोई कमी नहीं होती है, लेकिन इसके बावजूद वहां पढ़ने वाले छात्रों के दिलों में एक गहरा अकेलापन घर कर जाता है। घर-परिवार, दोस्तों और अपने पुराने परिवेश से अचानक दूर होकर एक अनजान शहर और हॉस्टल के बंद कमरे में रहना कई युवाओं के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होता है। भाषा की समस्या, क्षेत्रीय अंतर, हॉस्टल की रैगिंग के दबे-छिपे रूप और कई बार वरिष्ठों या साथियों के बीच खुद को समायोजित न कर पाना छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ देता है। आधुनिक डिजिटल युग में जहां लोग स्क्रीन से तो जुड़े हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाएं और दिल से बातचीत करने का चलन कम होता जा रहा है, वहाँ छात्र अपने दिल का दर्द अपने तक ही सीमित रख लेते हैं। जब हॉस्टल के कमरे में कोई सहपाठी मदद के लिए आगे नहीं आता और चारों तरफ केवल पढ़ाई और करियर की ही बातें होती हैं, तो वह अकेलापन एक मानसिक बीमारी का रूप ले लेता है, जो अंततः किसी बड़े हादसे का कारण बनता है।

प्लेसमेंट की चिंता और करियर को लेकर अत्यधिक असुरक्षा की भावना

इन संस्थानों में आने वाले छात्रों का मुख्य उद्देश्य एक शानदार करियर और भारी-भरकम पैकेज हासिल करना होता है, ताकि वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधार सकें। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबल मार्केट में आई मंदी, टेक सेक्टर में छंटनी और कंपनियों द्वारा की जाने वाली चुनिंदा हायरिंग के कारण कैंपस प्लेसमेंट का परिदृश्य भी काफी बदला है। छात्रों के मन में यह डर हमेशा बना रहता है कि यदि उन्हें अच्छी कंपनी में नौकरी नहीं मिली, तो उनके चार साल की मेहनत और परिवार द्वारा लगाया गया पैसा बेकार हो जाएगा। यह करियर इनसिक्योरिटी छात्रों के मन में असफलता का ऐसा भय पैदा करती है कि वे रात-दिन सिर्फ इसी उधेड़बड़ में डूबे रहते हैं। प्लेसमेंट सीजन के दौरान जब कुछ छात्रों को उनकी उम्मीद के मुताबिक नौकरियां नहीं मिलतीं, तो वे पूरी तरह टूट जाते हैं और उन्हें लगने लगता है कि उनकी पूरी जिंदगी ही बर्बाद हो चुकी है। यह संकीर्ण सोच और भविष्य को लेकर अत्यधिक अनिश्चितता का भाव युवाओं के मानसिक संतुलन को हिलाकर रख देता है।

संस्थानों और सरकार की जिम्मेदारी, काउंसलिंग सिस्टम को मजबूत करने की सख्त जरूरत

इन 115 जिंदगियों के जाने के बाद अब समय आ गया है कि केवल शोक व्यक्त करने के बजाय जमीनी स्तर पर ठोस और संवेदनशील कदम उठाए जाएं। आईआईटी प्रशासन, सरकार और शिक्षा मंत्रालय को मिलकर एक ऐसा पारदर्शी और प्रभावी तंत्र विकसित करना होगा जिसमें छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। परिसरों में केवल औपचारिकता के लिए काउंसलर नियुक्त करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हर विभाग में ऐसे मनोवैज्ञानिकों की तैनाती होनी चाहिए जो छात्रों के हाव-भाव और उनकी मानसिक स्थिति को समय रहते भांप सकें। इसके अलावा, ग्रेड्स और कॉम्पिटिशन के कल्चर को थोड़ा लचीला बनाना होगा ताकि छात्र खुद को केवल एक नंबर या सीजीपीए (CGPA) न समझें। माता-पिता को भी समझना होगा कि बच्चे की जान और उसकी मानसिक शांति किसी भी डिग्री या पैकेज से कहीं अधिक मूल्यवान है। यदि हमने समय रहते इन व्यवस्थागत कमियों को दूर नहीं किया, तो देश के इन मंदिरों से इस तरह की बुरी खबरें आनी बंद नहीं होंगी, जो पूरे राष्ट्र के लिए एक बहुत बड़ा कलंक और अपूरणीय क्षति है।