Education System Crisis: भारत में 94,000 सरकारी स्कूलों में लगा ताला; नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा!

Education System Crisis: भारत में 94,000 सरकारी स्कूलों में लगा ताला; नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा!

देश में बुनियादी शिक्षा को मजबूत करने के सरकारी दावों के बीच नीति आयोग (Niti Aayog) की एक हालिया रिपोर्ट ने देश के शिक्षा क्षेत्र में खलबली मचा दी है। नीति आयोग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 94,000 सरकारी स्कूलों पर ताला लग चुका है यानी इन्हें या तो पूरी तरह बंद कर दिया गया है या फिर पड़ोसी स्कूलों में इनका विलय (Merger) कर दिया गया है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद देश की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है।

आखिर क्यों बंद हुए देश भर के 94 हजार सरकारी स्कूल?

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इन स्कूलों के बंद होने और उनके विलय के पीछे कई बड़े और ठोस कारण गिरेबान में झांकने के लिए मजबूर करने वाले बताए हैं:

  • छात्रों की बेहद कम संख्या (Zero or Low Enrollment): रिपोर्ट के अनुसार, बंद या विलय किए गए अधिकांश स्कूल ऐसे थे जहां छात्रों की संख्या 15 या 20 से भी कम रह गई थी। कई स्कूलों में तो लंबे समय से शून्य (Zero) नामांकन चल रहा था।

  • शिक्षकों की भारी कमी (Teacher Shortage): देश के ग्रामीण और सुदूर इलाकों में बने स्कूलों में शिक्षकों की गंभीर कमी देखी गई। कई स्कूल केवल एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे थे, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता लगातार गिरती गई और अभिभावकों का मोहभंग होता गया।

  • बुनियादी सुविधाओं का अभाव: पीने के साफ पानी, बिजली, चालू शौचालय (विशेष रूप से छात्राओं के लिए) और खेल के मैदान जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण भी छात्रों ने इन स्कूलों से दूरी बना ली।

'स्कूल मर्जर' (School Merger) नीति और नीति आयोग की दलीलें

नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, कई राज्यों में लागू की गई स्कूल मर्जर (विलय) नीति के तहत यह कदम उठाया गया है। सरकार की दलील है कि 1-2 किलोमीटर के दायरे में स्थित छोटे और कम संसाधनों वाले स्कूलों को एक बड़े 'अंब्रेला स्कूल' या 'संकुल स्कूल' में मिला दिया जाए।

इससे न केवल सरकारी संसाधनों की बर्बादी रुकती है, बल्कि एक ही बड़े स्कूल में पर्याप्त शिक्षक, कंप्यूटर लैब, खेलकूद की सुविधाएं और बेहतर बुनियादी ढांचा (Infrastructure) मुहैया कराना आसान हो जाता है। हालांकि, जमीनी स्तर पर इसका नुकसान गरीब और ग्रामीण बच्चों को उठाना पड़ रहा है, जिन्हें अब स्कूल जाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है।

किन राज्यों में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर?

नीति आयोग की रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि स्कूलों के बंद होने और उनके विलय की यह समस्या कुछ चुनिंदा राज्यों में बहुत ज्यादा गंभीर है। मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे बड़े राज्यों में हजारों प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों का विलय किया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक तरफ निजी स्कूल तेजी से अपने पैर पसार रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकारी शिक्षा तंत्र का इस तरह सिमटना देश के ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के भविष्य के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।

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