अमेरिकी यूनिवर्सिटी के इस प्रोफेसर ने भारतीय स्टूडेंट्स को दी कड़ी चेतावनी
विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने और खासकर अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज से मास्टर डिग्री हासिल करके एक शानदार करियर बनाने का सपना देखने वाले भारतीय विद्यार्थियों के लिए एक बेहद चौंकाने वाली और आंखें खोल देने वाली खबर सामने आई है। हर साल लाखों की संख्या में भारतीय छात्र अपने परिवार की गाढ़ी कमाई खर्च करके या भारी-भरकम बैंक लोन लेकर अमेरिका की धरती पर कदम रखते हैं, इस उम्मीद में कि उनकी पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें बड़ी-बड़ी कंपनियों में नौकरियां मिल जाएंगी और वे एक अमेरिकी लाइफस्टाइल जी सकेंगे। लेकिन इन सबके बीच अमेरिका की एक जानी-मानी यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने भारतीय स्टूडेंट्स और उनके अभिभावकों को सीधे तौर पर एक सनसनीखेज और यथार्थवादी चेतावनी दी है। उस प्रोफेसर ने दो टूक शब्दों में यह सलाह दी है कि इस समय 'मास्टर्स करने अमेरिका मत आओ', क्योंकि वर्तमान आर्थिक परिदृश्य, वीजा संकट और जॉब मार्केट की दयनीय स्थिति को देखते हुए छात्रों को न तो मनमुताबिक नौकरियां मिल पा रही हैं और न ही उनके एच-1बी (H-1B) वीजा या ग्रीन कार्ड की राह आसान बची है। इस चेतावनी के सामने आने के बाद से उन तमाम युवाओं और परिवारों के बीच चिंता की लहर दौड़ गई है जो विदेश जाकर पढ़ने का सपना संजोए बैठे थे।
क्या है अमेरिकी प्रोफेसर की इस चेतावनी के पीछे की मुख्य वजह और मौजूदा हालात?
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और जॉब मार्केट के जानकारों का यह मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका के भीतर कॉर्पोरेट सेक्टर, टेक कंपनियों और वित्तीय संस्थानों में लगातार छंटनी (Layoffs) का दौर चल रहा है। अमेरिका में जब बड़ी-बड़ी टेक और कंसल्टिंग कंपनियों ने हजारों अमेरिकी नागरिकों और अनुभवी पेशेवरों को बाहर का रास्ता दिखाया है, तो ऐसी स्थिति में हाल ही में मास्टर डिग्री पूरी करके निकलने वाले विदेशी छात्रों (International Students) के लिए बाजार में टिक पाना बेहद कठिन हो गया है। प्रोफेसर ने अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया है कि छात्र केवल विश्वविद्यालयों के आकर्षक विज्ञापनों और प्लेसमेंट के पुराने आंकड़ों को देखकर लाखों डॉलर खर्च कर देते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ग्राउंड रियलिटी अब पूरी तरह से बदल चुकी है। वीजा के नियमों की पेचीदगियां और हर साल सीमित संख्या में निकलने वाले एच-1बी वीजा के लॉटरी सिस्टम ने छात्रों के भविष्य को अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया है, जिससे पढ़ाई पूरी होने के बाद भी कई छात्र अवैध रूप से देश में रहने या मजबूरन वापस लौटने को विवश हो रहे हैं।
जॉब मार्केट का सूखा और एच-1बी वीजा का कड़ा संकट बना सबसे बड़ा सिरदर्द
अमेरिका में पढ़ाई करने वाले किसी भी विदेशी छात्र के लिए ग्रेजुएशन के बाद 'ऑप्टिकल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग' (OPT) पीरियड के दौरान नौकरी ढूंढना अनिवार्य होता है, ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें और अमेरिकी कंपनियों से स्पॉन्सरशिप हासिल कर सकें। लेकिन मौजूदा समय में स्थिति यह है कि कंपनियां वीजा स्पॉन्सर करने से कतरा रही हैं, क्योंकि इसमें भारी कानूनी खर्च और समय की बर्बादी होती है। जब तक कोई छात्र किसी रजिस्टर्ड कंपनी से जॉब ऑफर हासिल नहीं कर लेता, तब तक उसका लीगल स्टेटस खतरे में पड़ जाता है। इसके अलावा, पिछले कुछ सालों में एच-1बी वीजा के लिए आने वाले आवेदनों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, जिसके चलते लॉटरी सिस्टम में चयन होना हर किसी के बस की बात नहीं रही। यही कारण है कि मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद भी अनगिनत भारतीय छात्र महीनों तक धक्के खाते रहते हैं और अंततः निराशा उनके हाथ लगती है।
भारत में बढ़ते अवसर और विदेशों में भारी निवेश के बीच तुलना की जरूरत
प्रोफेसर की इस चेतावनी के बाद देश के शिक्षाविदों और आर्थिक विश्लेषकों का यह कहना है कि अब समय आ गया है जब भारतीय छात्रों और उनके माता-पिता को पश्चिमी देशों की चकाचौंध से बाहर निकलकर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। आज के समय में भारत का घरेलू बाजार, स्टार्टअप इकोसिस्टम, तकनीकी और औद्योगिक क्षेत्र तेजी से विकास कर रहा है, जहां स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है। अमेरिका या अन्य पश्चिमी देशों में जाकर लाखों-करोड़ों रुपये का कर्ज लेने और वहां जाकर मानसिक तनाव तथा अनिश्चितता का सामना करने से बेहतर है कि छात्र अपनी मातृभूमि में रहकर अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग करें। यदि कोई छात्र अत्यधिक मेधावी है और उसके पास स्कॉलरशिप या पुख्ता प्रबंध है, तो बात अलग है, अन्यथा सिर्फ भेड़चाल में आकर बिना सोचे-समझे अमेरिका का रुख करना आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से खतरनाक साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: विदेश जाने से पहले छात्रों और अभिभावकों को क्यों बरतनी चाहिए सावधानी?
अंत में यह कहा जा सकता है कि अमेरिका में मास्टर्स डिग्री हासिल करने का सपना अब पहले जितना आसान और सुनहरा नहीं रहा है। इस अमेरिकी प्रोफेसर का यह बयान किसी हताશા को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि भारतीय युवाओं को जमीनी हकीकत से रूबरू कराने के लिए एक आईना है। विदेश जाने का फैसला करने से पहले हर छात्र को वहां की मौजूदा अर्थव्यवस्था, वीजा कानूनों, लोन के बोझ और जॉब मार्केट की उपलब्धता का बारीकी से आकलन कर लेना चाहिए, ताकि बाद में पछतावे के सिवा कुछ न बचे।