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Up kiran,Digital Desk : जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (LG) मनोज सिन्हा ने आतंकवाद और देशद्रोह के खिलाफ अब तक का सबसे सख्त रुख अख्तियार किया है। वीरवार को जम्मू विश्वविद्यालय में एक पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान एलजी ने आतंकियों और उनके मददगारों को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि देश के साथ गद्दारी करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आतंकवाद के ईको-सिस्टम को इस कदर नेस्तनाबूद किया जाएगा कि आने वाली पीढ़ियां भी इसे याद रखेंगी।

"गद्दारों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा"

उपराज्यपाल ने सुरक्षा एजेंसियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि आतंकवाद से जुड़ी हर पुरानी और नई घटना की परतें खोली जाएंगी। उन्होंने कहा:

"जो लोग देश के खिलाफ साजिश रच रहे हैं या आतंकियों की मदद कर रहे हैं, उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा। सजा ऐसी होनी चाहिए कि आतंक फैलाने वाले रहम की भीख मांगते नजर आएं। जनता के सपनों को बर्बाद करने वालों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा।"

कश्मीरी पंडितों की वापसी: "प्रधानमंत्री का अटूट वादा"

प्रो. अशोक कौल की पुस्तक 'कश्मीर-नेटिविटी रीगेंड' के विमोचन के दौरान एलजी सिन्हा कश्मीरी पंडितों के दर्द पर भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि अपनी ही धरती पर अजनबी बन जाना दुनिया का सबसे बड़ा दुख है।

सम्मानजनक वापसी: एलजी ने दोहराया कि कश्मीरी पंडितों की पूरी इज्जत और सुरक्षा के साथ घर वापसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वादा है।

अनुच्छेद 370 का प्रभाव: उन्होंने कहा कि अगस्त 2019 के बाद कश्मीरी पंडितों में अपनी जड़ों की ओर लौटने का भरोसा जगा है। विस्थापित परिवारों की जमीनों को वापस दिलाने के लिए 'माइग्रेंट वेब पोर्टल' प्रभावी ढंग से काम कर रहा है।

आतंकियों ने मुसलमानों का भी बहाया खून

मनोज सिन्हा ने युवा पीढ़ी को आगाह करते हुए कहा कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद ने केवल एक समुदाय को नहीं, बल्कि हजारों निर्दोष कश्मीरी मुसलमानों को भी निशाना बनाया है। उन्होंने कहा कि आतंकियों ने घाटी की रूह और तहजीब को जख्मी किया है, लेकिन अब न्याय का समय शुरू हो गया है।

दशकों की चुप्पी तोड़ने की कोशिश

एलजी ने प्रो. कौल की किताब की सराहना करते हुए कहा कि यह केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि उस सामूहिक चुप्पी को तोड़ने का प्रयास है जो दशकों से कश्मीरी पंडितों के पलायन पर छाई हुई थी। उन्होंने समुदाय के जज्बे को सलाम किया जिन्होंने भारी संघर्ष के बावजूद अपनी संस्कृति, दर्शन और परंपराओं को जीवित रखा।