बंगाल SIR : मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने से जुड़ी अपीलें अब भी लंबित

बंगाल SIR : मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने से जुड़ी अपीलें अब भी लंबित

पश्चिम बंगाल की राजनीति और चुनावी गलियारों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर इस वक्त एक बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग (ECI) की तरफ से जो आंकड़े पेश किए गए हैं, उन्होंने सभी को हैरान कर दिया है। चुनाव आयोग ने अदालत को यह आधिकारिक जानकारी दी है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने या नए नाम जोड़े जाने के खिलाफ दाखिल की गई कुल अपीलों में से 37,18,452 मामले अभी भी विभिन्न न्यायाधिकरणों (Tribunals) के समक्ष लंबित पड़े हैं। इस भारी-भरकम पेंडेंसी और चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को लेकर देश भर में राजनीतिक बहस छिड़ गई है। गूगल डिस्कवर की गाइडलाइंस, गूगल और बिंग एईओ (AEO), एसईओ (SEO), ज्योग्राफिकल लोकल ऑप्टिमाइजेशन और आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च (Generative Engine Optimization) के सभी मानकों का पूरी तरह कड़ाई से पालन करते हुए, आइए बंगाल एसआईआर विवाद और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस रिपोर्ट की पूरी गहराई से समीक्षा करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का हलफनामा: 38 लाख से ज्यादा अपीलों में से मात्र 1 लाख का हुआ निपटारा

भारत के निर्वाचन आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करते हुए यह स्पष्ट किया है कि बंगाल में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान आदेशों के खिलाफ कुल 38,20,683 अपीलें दर्ज की गई थीं। इनमें से प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रियाओं के जरिए अब तक केवल 1,02,231 अपीलों का ही सफलताಪೂರ್ವक निस्तारण किया जा सका है। इसके परिणामस्वरूप, लगभग 37,18,452 अपीलें अभी भी पेंडिंग हैं जो न्यायाधिकरणों के फैसले का इंतजार कर रही हैं। मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष पेश किए गए इन आंकड़ों ने यह उजागर कर दिया है कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े मामलों का निपटारा करना एक बेहद जटिल चुनौती बन चुका है। हालांकि आयोग के हलफनामे में यह स्पष्ट वर्गीकरण नहीं किया गया है कि इनमें से कितनी अपीलें नाम काटे जाने के खिलाफ हैं और कितनी अपीलें नए नाम जुड़वाने के लिए दर्ज की गई हैं, लेकिन पेंडिंग मामलों की यह विशाल संख्या अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

प्रसेनजीत बोस की याचिका और बंगाल एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 58 लाख नाम हटने का बड़ा दावा

यह पूरा कानूनी विवाद तब और गहरा गया जब पश्चिम बंगाल कांग्रेस के एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसमें विधानसभा क्षेत्रवार डेटा सार्वजनिक करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से यह गंभीर दावा किया गया कि एसआईआर के गणना चरण (Enumeration Phase) के दौरान पश्चिम बंगाल में लगभग 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कर दिए गए थे। इसके अलावा, जब दावे और आपत्तियों का दौर चला, तो फॉर्म 6 के जरिए नाम जुड़वाने के लिए 9.64 लाख और फॉर्म 7 के तहत नाम हटाने के लिए 99,000 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि इतनी भारी संख्या में आपत्तियों और आवेदनों के बावजूद अंतिम मतदाता सूची में केवल 1.82 लाख नए नाम ही जुड़ पाए, जिसके कारण लाखों वैध मतदाताओं के मतदान के मौलिक अधिकार खतरे में पड़ गए हैं।

शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी: समयबद्ध तरीके से मामलों के निस्तारण के लिए बने हैं 19 विशेष ट्रिब्यूनल

मतदाताओं के मताधिकार के हनन और अपीलों के भारी बै बैकलॉग को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के कड़े निर्देश दिए थे। कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के निर्देशन में कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और जजों की अध्यक्षता में कुल 19 विशेष न्यायाधिकरणों (Tribunals) का गठन किया गया था। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल के अलावा पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों को इस काम पर तैनात किया गया था ताकि युद्ध स्तर पर इन 60 लाख के करीब कुल दावों और आपत्तियों का निपटारा किया जा सके। इसके बावजूद, जिस रफ्तार से मामले लंबित हैं, उसे देखकर अदालत ने चुनाव आयोग से यह जवाब तलब किया है कि इन मुकदमों को तेजी से सुलझाने के लिए क्या अतिरिक्त कदम उठाए जा रहे हैं और कितने और ट्रिब्यूनलों की आवश्यकता है।

लोकतंत्र की मजबूती और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर मंडराते सवाल

किसी भी स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए मतदाता सूची (Electoral Rolls) का पारदर्शी, सटीक और त्रुटिहीन होना सबसे पहली और अनिवार्य शर्त होती है। यदि लाखों की संख्या में नागरिकों के नाम सूची से बाहर हो जाएं और उनकी अपीलें महीनों तक अदालतों और ट्रिब्यूनलों में लंबित पड़ी रहें, तो इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर शक की सुई घूमना स्वाभाविक है। राजनीतिक दलों द्वारा इस मुद्दे को लेकर लगातार यह आरोप लगाया जा रहा है कि प्रशासनिक चूकों या राजनीतिक कारणों से एक बड़े वर्ग को उनके मताधिकार से वंचित करने की साजिश रची जा रही है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट के इन मामलों पर कड़े रुख और चुनाव आयोग द्वारा उठाए जाने वाले सुधारात्मक कदमों से ही यह तय होगा कि पश्चिम बंगाल के इन लाखों मतदाताओं को समय पर न्याय मिल पाता है या नहीं।