देश के अन्नदाताओं पर दोहरी आफत! मॉनसून में भारी गिरावट और महंगे डीजल का डबल अटैक, जानें अब क्या करें किसान

देश के अन्नदाताओं पर दोहरी आफत! मॉनसून में भारी गिरावट और महंगे डीजल का डबल अटैक, जानें अब क्या करें किसान

भारत के कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। आसमान से बरसने वाली मॉनसूनी राहत इस बार उम्मीद के मुताबिक नहीं रहने वाली है, जिसने देश के करोड़ों किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। एक तरफ जहां प्रकृति अपना रुख बदल रही है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक हालातों के कारण महंगे होते ईंधन ने किसानों की लागत को आसमान पर पहुंचा दिया है। संकट की इस घड़ी में देश के अन्नदाताओं को खेती बचाने के लिए अब पारंपरिक ढर्रे से निकलकर नई तकनीकों का रुख करना होगा।

मौसम विभाग ने घटाया मॉनसून का अनुमान, तीन साल में सबसे कमजोर बारिश की आशंका

भारत सरकार ने इस साल के मॉनसून को लेकर अपना पूर्व अनुमान घटा दिया है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ किया है कि जून से सितंबर के दौरान देश में कुल बारिश लंबी अवधि के औसत (LPA) का महज 90% रहने की संभावना है। इसमें 4% ऊपर या नीचे की गुंजाइश (एरर मार्जिन) रखी गई है। इससे पहले अप्रैल महीने में मौसम विभाग ने 92% बारिश का अनुमान जताया था। पिछले तीन सालों में यह पहला मौका है जब मॉनसून के इतना कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में 'सामान्य से कम' बारिश की श्रेणी में रखा जाता है।

अल-नीनो का बढ़ता साया और 'सामान्य बारिश' का गणित

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, बारिश में इस अचानक आ रही कमी की मुख्य वजह 'अल-नीनो' (El Nino) पैटर्न को माना जा रहा है। अल-नीनो एक ऐसा समुद्री और वायुमंडलीय प्रभाव है जो वैश्विक स्तर पर मौसम चक्र को बिगाड़ता है और भारत में इसके चलते अक्सर सूखा या कम बारिश की स्थिति बनती है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मानकों के अनुसार, पिछले 50 सालों में देश में औसतन 87 सेंटीमीटर (35 इंच) बारिश दर्ज की गई है। जब कुल बारिश इस औसत के 96% से 104% के बीच होती है, तभी उसे 'सामान्य मॉनसून' कहा जाता है। चूंकि इस बार यह आंकड़ा सिर्फ 90% पर सिमटने का अनुमान है, इसलिए कृषि क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है।

ईरान युद्ध और मध्य पूर्व के तनाव ने बढ़ाई डीजल की मार

किसानों के लिए यह संकट सिर्फ आसमानी आफत तक सीमित नहीं है। इस समय मध्य पूर्व में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और ईरान युद्ध ने वैश्विक तेल बाजार में आग लगा दी है। तेल व्यापार के सबसे प्रमुख समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से होने वाली सप्लाई बाधित होने के कारण कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। इसी भारी दबाव के चलते घरेलू तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा दी हैं। कम बारिश होने के कारण किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए मजबूरन डीजल पंपों का सहारा लेना पड़ेगा, जिससे उनकी खेती की लागत कई गुना बढ़ जाएगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर मंडराया संकट

मॉनसून को भारतीय अर्थव्यवस्था की 'लाइफलाइन' कहा जाता है, क्योंकि देश के खेतों की सिंचाई और जलाशयों-भूजल को रीचार्ज करने के लिए 70% पानी इसी सीजन से मिलता है। भारत दुनिया में चावल, चीनी और कपास के सबसे बड़े उत्पादकों में शामिल है। बारिश कम होने की स्थिति में फसलों का उत्पादन प्रभावित होना तय है। बाजार में खाद्यान्न की कमी और महंगाई को रोकने के लिए सरकार ने अभी से एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, जिसके तहत इसी महीने 30 सितंबर तक चीनी के निर्यात (Export) पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। इतिहास गवाह है कि जब भी अल-नीनो सक्रिय हुआ है, सरकार को अनाज के एक्सपोर्ट पर सख्त पाबंदियां लगानी पड़ी हैं।

संकट से निपटने के अचूक उपाय: अब किसानों को क्या कदम उठाने चाहिए?

इस दोहरी आफत से निपटने और अपनी फसल को मुनाफे में बदलने के लिए किसानों को अपनी रणनीति में तुरंत बदलाव करना होगा:

  • फसल विविधीकरण (Crop Diversification) अपनाएं: धान और गन्ने जैसी फसलों में अत्यधिक पानी की जरूरत होती है। इस बार किसान इनके स्थान पर कम पानी में बंपर पैदावार देने वाले मोटे अनाज (Millets) जैसे बाजरा, रागी, ज्वार के साथ-साथ मक्का, दालें और तिलहन की बुवाई को प्राथमिकता दें। बाजार में इस समय मोटे अनाजों की मांग और कीमतें दोनों ही बेहतरीन हैं।

  • सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल: पारंपरिक तरीके से पूरे खेत को पानी से भरने के बजाय ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई) प्रणाली को अपनाएं। इन तकनीकों से 50% से 70% तक पानी की बचत होती है और नमी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचती है।

  • पीएम कुसुम योजना (PM-KUSUM) का उठाएं लाभ: डीजल के बढ़ते खर्च से बचने के लिए किसान सरकार की महत्वाकांक्षी सोलर पंप योजना का लाभ लें। इस योजना के तहत सोलर पंप लगाने पर सरकार द्वारा भारी सब्सिडी दी जा रही है, जिससे सिंचाई का ईंधन खर्च घटकर लगभग शून्य हो जाएगा।

 

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