सिक्किम में जमीन से 5 KM नीचे डोली धरती, कुछ ही देर में 2 बार भूकंप से थर्राया तिब्‍बत, 7 लाख लोगों पर टूटी आफत

सिक्किम में जमीन से 5 KM नीचे डोली धरती, कुछ ही देर में 2 बार भूकंप से थर्राया तिब्‍बत, 7 लाख लोगों पर टूटी आफत

हिमालय की गोद में बसे बेहद संवेदनशील और प्राकृतिक रूप से खूबसूरत पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम से लेकर पड़ोसी तिब्बत के पहाड़ी इलाकों तक एक बार फिर प्रकृति का भयंकर रूप देखने को मिला है, जिसने वहां रहने वाले लाखों आम नागरिकों के दिलों में गहरी दहशत पैदा कर दी है। धरती के भीतर चल रही टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल एक बार फिर इतनी तीव्र हो गई कि कुछ ही मिनटों के अंतराल पर लगातार दो बार आए शक्तिशाली भूकंपों से पूरा क्षेत्र बुरी तरह थर्रा उठा। मौसम विज्ञान और राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) से मिली शुरुआती रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बार भूकंप का केंद्र जमीन की सतह से बहुत ज्यादा नीचे नहीं बल्कि महज 5 किलोमीटर की गहराई पर स्थित था, जिसके कारण झटकों की तीव्रता जमीन की सतह पर बेहद खतरनाक और डरावनी महसूस की गई। जैसे ही घरों की दीवारें हिलने लगीं और सामान नीचे गिरने लगा, लोग अपनी जान बचाने के लिए घरों और दफ्तरों से निकलकर खुले आसमान के नीचे और सड़कों पर भागने लगे। सिक्किम और तिब्बत के सीमावर्ती पहाड़ी इलाकों में इस प्राकृतिक आपदा के कारण लगभग 7 लाख से अधिक की आबादी सीधे तौर पर प्रभावित हुई है, जिससे स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन तंत्र पूरी तरह से अलर्ट मोड पर आ गया है।

जमीन से सिर्फ 5 किलोमीटर नीचे था केंद्र, इसलिए महसूस हुए भीषण झटके

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो किसी भी भूकंप के दौरान उसका केंद्र (Epicenter) जमीन की जितनी कम गहराई पर होता है, सतह पर उसकी तबाही का दायरा और झटकों की विभीषिका उतनी ही अधिक खतरनाक होती है। इस बार सिक्किम के पर्वतीय भूभाग और तिब्बत के पठारी छोर पर जो भूकंप दर्ज किए गए, उनकी गहराई मात्र 5 किलोमीटर रिकॉर्ड की गई, जिसे भूवैज्ञानिकों की भाषा में बहुत उथला (Shallow Focus Earthquake) माना जाता है। यही मुख्य कारण था कि जैसे ही धरती डोली, घरों की नींव हिल गई और लोगों को ऐसा महसूस हुआ मानो कोई बहुत बड़ा धमाका हुआ हो। कुछ ही क्षणों के भीतर आए दूसरे झटके ने लोगों के बचे-खुचेौौ हौसले को भी तोड़ दिया, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में कोहराम मच गया। पहाड़ी ढलानों पर बने कच्चे और पक्के मकानों की दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें आने की खबरें सामने आ रही हैं, जबकि कई स्थानों पर पहाड़ों के खिसकने यानी लैंडस्लाइड (Landslide) की आशंका से रास्तों को एहतियात के तौर पर रोक दिया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में इतने कम अंतराल पर इतने डरावने और झकझोर देने वाले झटके पहले कभी महसूस नहीं किए थे।

7 लाख लोगों की आबादी पर संकट, तिब्बत और सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी दहशत

इस दोहरे भूकंप की चपेट में आने वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में लगभग 7 लाख लोगों की घनी आबादी निवास करती है, जो पहले से ही कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और कठोर मौसम का सामना करती है। सिक्किम के दूरदराज के पहाड़ी गांवों से लेकर तिब्बत के उच्च पर्वतीय इलाकों तक संचार माध्यम और बिजली की आपूर्ति कुछ समय के लिए बाधित हो गई, जिससे राहत और बचाव कार्यों में शुरुआती दौर में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने तुरंत प्रभाव से सभी संबंधित जिलों के जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को निर्देश जारी कर दिए हैं कि वे जमीनी स्तर पर जाकर नुकसान का जायजा लें। हालांकि अभी तक किसी बड़े जानमाल के नुकसान की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में कई पुराने घरों के ढहने और मलबे में घरेलू सामान दबने की सूचनाएं लगातार मिल रही हैं। पहाड़ों के बीच बसे होने के कारण राहत दलों का उन दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है, जहां फोन और इंटरनेट के टावर पूरी तरह से ठप हो चुके हैं। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें और संभावित आफ्टरशॉक्स (Aftershocks) को देखते हुए अगले कुछ दिनों तक पूरी तरह से सतर्क और सुरक्षित स्थानों पर रहें।

हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और भविष्य के खतरे पर विशेषज्ञों की चेतावनी

इस बार की घटना ने एक बार फिर पर्यावरणविदों और भूवैज्ञानिकों की उस पुरानी चिंता को उजागर कर दिया है, जिसमें वे लगातार यह चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालयी बेल्ट (Himalayan Seismic Zone) दुनिया के सबसे अधिक भूकंपीय रूप से सक्रिय और संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के नीचे लगातार खिसकते जाना इस क्षेत्र में बड़े और छोटे भूकंपों का मुख्य कारण बनता है। समय-समय पर इस तरह की उथली गहराई वाले झटके इस बात का संकेत होते हैं कि पृथ्वी के गर्भ में ऊर्जा का बहुत बड़ा दबाव जमा हो रहा है, जिसे समय-समय पर इस प्रकार के झटकों के माध्यम से बाहर निकलना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के पहाड़ी और आपदा-संवेदनशील क्षेत्रों में भविष्य के बड़े खतरों से निपटने के लिए भवनों के निर्माण के नियमों (Building Bye-laws) को और अधिक सख्त बनाने की आवश्यकता है ताकि झटके आने पर भी बुनियादी ढांचे को न्यूनतम नुकसान हो। फिलहाल सिक्किम और तिब्बत के इस पूरे क्षेत्र में लोग रात खुले आसमान के नीचे या सुरक्षित राहत शिविरों में बिताने को मजबूर हैं, क्योंकि अभी भी छोटे-छोटे आफ्टरशॉक्स महसूस किए जाने का सिलसिला जारी है, और हर कोई बस यही प्रार्थना कर रहा है कि स्थिति जल्द से जल्द पूरी तरह सामान्य हो जाए।