कम पानी में खेती को मिलेगा पोषण, काजरी और सरकार की पहल से खेतों की सेहत सुधारने की तैयारी

कम पानी में खेती को मिलेगा पोषण, काजरी और सरकार की पहल से खेतों की सेहत सुधारने की तैयारी

देश के शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में पानी की लगातार विकराल होती समस्या और गिरते भूजल स्तर के बीच भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक बेहद राहतभरी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। कम पानी वाले और रेगिस्तानी क्षेत्रों में खेती को अधिक उपजाऊ और टिकाऊ बनाने के लिए केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान यानी काजरी (CAZRI - Central Arid Zone Research Institute) और राज्य सरकार ने मिलकर एक बड़ा रणनीतिक मास्टरप्लान तैयार किया है। इस विशेष पहल का मुख्य उद्देश्य कम से कम पानी के इस्तेमाल से फसलों को पूरा पोषण देना और बंजर होती जमीनों व खेतों की सेहत में क्रांतिकारी सुधार लाना है। कृषि वैज्ञानिकों और सरकारी विशेषज्ञों की यह संयुक्त मुहिम विशेष रूप से पश्चिमी राजस्थान, बुंदेलखंड और देश के अन्य सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों के लिए वरदान साबित होने जा रही है। आधुनिक कृषि तकनीकों, माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स और सॉइल हेल्थ मैनेजमेंट के इस बेजोड़ संगम से न केवल किसानों की पैदावार दोगुनी होगी, बल्कि जल संरक्षण की दिशा में भी देश एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।

काजरी और सरकार का जॉइंट मास्टरप्लान: जानिए कम पानी में कैसे सुधरेगी मिट्टी की सेहत?

शुष्क क्षेत्रों में खेती की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि पानी की कमी के कारण मिट्टी में मौजूद जरूरी पोषक तत्व पौधों की जड़ों तक नहीं पहुंच पाते, जिससे फसलें सूख जाती हैं या उनकी पैदावार बेहद कम होती है। इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने के लिए काजरी के वैज्ञानिकों ने वर्षों के शोध के बाद कई विशेष जैविक कवक (Bio-fertilizers), नैनो-पोषक तत्व और वाटर-रीटेनिंग पॉलीमर तकनीक विकसित की है। सरकार इस नई तकनीक को बड़े पैमाने पर खेतों तक पहुंचाने के लिए विशेष अनुदान (Subsidy) और प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने जा रही है। इस योजना के तहत मिट्टी में ऐसे जैविक तत्वों का छिड़काव किया जाएगा जो कम नमी में भी मिट्टी के पोषक तत्वों को लंबे समय तक एक्टिव रखते हैं। इससे कम सिंचाई के बावजूद फसलों को भरपूर पोषण मिलता रहेगा और मिट्टी की प्राकृतिक संरचना तथा उसकी उर्वरता शक्ति (Soil Fertility) लंबे समय तक बनी रहेगी।

माइक्रो-इरिगेशन और ड्रिप टेक्नोलॉजी से मिलेगा फसलों को सीधा पोषण

काजरी की सिफारिशों के आधार पर सरकार अब पारंपरिक सिंचाई पद्धतियों के बजाय सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों जैसे ड्रिप इरिगेशन (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर सिस्टम (Sprinkler System) को हर खेत तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। इन आधुनिक प्रणालियों के साथ 'फर्टिगेशन' (Fertigation) तकनीक को जोड़ा जा रहा है, जिसमें पानी के साथ-साथ घुलनशील पोषक तत्व सीधे पौधे की जड़ों में बूंद-बूंद करके पहुंचाए जाते हैं। इस विधि से पानी की लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक बचत होती है और एक भी बूंद पानी या खाद व्यर्थ नहीं जाता। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जो किसान अब तक पानी की कमी के कारण अपनी जमीन को बंजर छोड़ने पर मजबूर थे, वे भी अब इस तकनीक के जरिए कम लागत में तिलहन, दलहन, औषधीय पौधों और बागवानी फसलों की बंपर पैदावार हासिल कर सकेंगे।

सॉइल हेल्थ कार्ड और डिजिटल मैपिंग के जरिए हर खेत का होगा वैज्ञानिक इलाज

खेतों की बिगड़ती सेहत को सुधारने के लिए इस अभियान के तहत व्यापक स्तर पर 'सॉइल हेल्थ कार्ड' (Soil Health Card) योजना को डिजिटल मैपिंग से जोड़ा जा रहा है। काजरी की लैब टीम और कृषि मित्र गांव-गांव जाकर हर खेत की मिट्टी के सैंपल लेंगे और उसकी विस्तृत जांच करेंगे। जांच रिपोर्ट के आधार पर किसान को उसके मोबाइल पर डिजिटल हेल्थ कार्ड मिलेगा, जिसमें यह स्पष्ट रूप से लिखा होगा कि उसकी मिट्टी में किस पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन, जिंक, फास्फोरस या पोटेशियम) की कमी है। किसान को केवल उतनी ही मात्रा में जैविक या रासायनिक खाद डालनी होगी जितनी मिट्टी को जरूरत है। इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनावश्यक रासायनिक खादों के इस्तेमाल पर रोक लगेगी, जिससे मिट्टी का रासायनिक संतुलन बिगड़ने से बचेगा और खेती की लागत में भारी कमी आएगी।

बंजर और रेगिस्तानी जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए काजरी के 'सुपर मॉडल्स'

काजरी ने राजस्थान के थार रेगिस्तान और सूखे इलाकों में कई ऐसे एग्रो-फॉरेस्ट्री और क्रॉपिंग मॉडल्स तैयार किए हैं जो बेहद कम पानी में भी हरा-भरा उत्पादन देते हैं। संस्थान ने बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार और जीरा जैसी पारंपरिक शुष्क फसलों की ऐसी उन्नत और सूखा-रोधी किस्में (Drought-Resistant Varieties) विकसित की हैं जो बेहद कम बारिश में भी बेहतरीन पैदावार देती हैं। इसके साथ ही, खेजड़ी, बेर, अनार और गुंदा जैसे बहुवर्षीय पौधों को फसलों के साथ मिलाकर लगाने की सलाह दी जा रही है। यह एग्रोफोरेस्ट्री मॉडल मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) को रोकता है और हवा में नमी बनाकर खेतों के माइक्रो-क्लाइमेट को बेहतर बनाता है, जिससे भीषण गर्मी और सूखे के थपेड़ों के बावजूद फसलें सुरक्षित रहती हैं।

किसानों की आय में बढ़ोतरी और पर्यावरण संरक्षण का नया युग

काजरी और सरकार की इस साझा पहल से न केवल जल संकट से जूझ रहे इलाकों की कृषि व्यवस्था को नया जीवन मिलेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक बड़ा बदलाव आएगा। भूजल के अत्यधिक दोहन पर रोक लगने से वाटर टेबल में सुधार होगा और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों (Organic Carbon) की मात्रा बढ़ेगी। सरकार का लक्ष्य है कि इस मॉडल को देश के सभी 100 से अधिक सूखा प्रभावित जिलों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए। इस दूरदर्शी कदम से कृषि क्षेत्र स्वावलंबी बनेगा, गांव से होने वाला पलायन रुकेगा और हमारे किसान प्राकृतिक आपदाओं व सूखे के बावजूद अपने खेतों से सोना उगाने में सक्षम हो सकेंगे।