सर्दियों में बकरियों पर मंडरा रहा PPR बीमारी का खतरा, ये लक्षण दिखते ही हो जाएं सावधान

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शिक्षा और सफलता को अक्सर एक-दूसरे का पर्याय माना जाता है, लेकिन जब समाज और व्यवस्था की अनदेखी के चलते एक अत्यधिक पढ़ा-लिखा युवा बेरोजगारी के अंधकार में खो जाता है, तो उसकी कहानी हर किसी की अंतरात्मा को झकझोर कर रख देती है। कुछ ऐसी ही दिल को दहला देने वाली और भावुक कर देने वाली दास्तान सामने आई है बिभास साहा की, जिसने अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर मास्टर्स (Post Graduation) की उच्च डिग्री हासिल की थी। बिभास का सपना था कि वह एक सम्मानजनक और अपनी योग्यता के अनुसार मनपसंद नौकरी पाकर अपने परिवार के दुखों को दूर करेगा। लेकिन डिग्रियों का पुलिंदा हाथों में होने के बावजूद जब सालों-साल उसे रोजगार का कोई सही अवसर नहीं मिला, तो वह निरंतर निराशा, पारिवारिक दबाव और अवसाद के दलदल में धंसता चला गया। अंततः असफलताओं के उस कड़वे घूंट को उसका दिमाग बर्दाश्त नहीं कर सका और उसने अपना मानसिक संतुलन पूरी तरह से खो दिया। आज यह होनहार युवक सड़कों और अपनों के बीच एक जिंदा लाश की तरह जीने को मजबूर है।

सपनों के आसमान से बेरोजगारी के पाताल तक: बिभास साहा के शुरुआती दिन और उच्च शिक्षा का सफर

बिभास साहा बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बेहद होनहार और कुशाग्र बुद्धि का छात्र था। उसके माता-पिता ने अपनी तंगहाली और सीमित संसाधनों के बावजूद पेट काटकर बिभास की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी। बिभास ने भी अपने परिवार के त्याग का मान रखा और कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी तक हर परीक्षा में अव्वल अंक प्राप्त किए। उसने जब मास्टर्स की डिग्री पूरी की, तो उसके पूरे गांव और मोहल्ले को उम्मीद थी कि अब इस घर के बुरे दिन खत्म होने वाले हैं। बिभास को खुद पर और अपनी योग्यताओं पर पूरा भरोसा था कि वह जल्द ही एक अच्छी और मनपसंद सरकारी या बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी हासिल कर लेगा। वह रोजाना घंटों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता और दर्जनों नौकरियों के लिए आवेदन पत्र भेजा करता था।

असफलताओं का अंतहीन सिलसिला और मनपसंद नौकरी न मिलने का गहरा सदमा

मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद बिभास ने लगातार कई इंटरव्यू दिए और प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल हुआ। कभी कुछ अंकों से उसका चयन रुक जाता, तो कभी वैकेंसी के रद्द होने या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाने की वजह से उसकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता। समय बीतने के साथ-साथ उसकी उम्र बढ़ती गई और उसके साथियों को छोटी-मोटी नौकरियां मिलती चली गईं, लेकिन बिभास अपनी योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक काम की तलाश में डटा रहा। जब सालों की अटूट मेहनत के बाद भी उसे अपनी मनपसंद नौकरी नहीं मिली, तो उसके अंदर का आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूटने लगा। रिश्तेदारों के ताने, समाज की उपेक्षा और घर की गिरती आर्थिक स्थिति ने उस पर मानसिक दबाव का पहाड़ तोड़ दिया। वह धीरे-धीरे खुद को कमरे में बंद करने लगा और अपनी असफलता का दोष खुद को देने लगा।

जब दिमाग ने छोड़ दिया साथ: निराशा के अंधेरे में खो गया होनहार युवा का मानसिक संतुलन

लगातार बढ़ते मानसिक तनाव, अवसाद (Depression) और अनिश्चित भविष्य की चिंता ने बिभास के दिमाग पर इतना गहरा और घातक असर डाला कि वह धीरे-धीरे अपनी सुध-बुध खोने लगा। शुरुआत में वह छोटी-छोटी बातों पर अजीब हरकतें करने लगा और खुद से बातें करने लगा। लेकिन जब यह बीमारी गंभीर रूप धारण कर गई, तो वह अपने आसपास के लोगों, दोस्तों और यहां तक कि अपने माता-पिता को भी पहचानने से इंकार करने लगा। जिस हाथ में कभी मास्टर्स की डिग्रियां और किताबें हुआ करती थीं, अब उन हाथों में बेड़ियां और बेबसी नजर आने लगी। जिस युवा को देश और समाज का भविष्य बनना था, वह अपनी मनपसंद नौकरी न मिलने के सदमे से पूरी तरह से मानसिक संतुलन खो बैठा।

बेबस माता-पिता के आंसू और शिक्षा व्यवस्था पर खड़े होते गंभीर सवाल

बिभास साहा की यह हालत देखकर उसके बुजुर्ग माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। पिता का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई अपने बेटे की पढ़ाई पर लगा दी थी ताकि वह एक दिन अपने पैरों पर खड़ा हो सके, लेकिन आज उनका बेटा उस मोड़ पर खड़ा है जहां से वापसी की कोई राह नजर नहीं आती। बिभास की यह दर्दनाक कहानी केवल एक व्यक्ति का व्यक्तिगत दुख नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली, रोजगार के घटते अवसरों और युवाओं में बढ़ते मानसिक तनाव पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। हर साल लाखों युवा डिग्रियां लेकर कॉलेजों से बाहर निकलते हैं, लेकिन जब उनकी योग्यता के अनुसार अवसर नहीं मिलते, तो इस प्रकार के भयावह परिणाम सामने आते हैं।

समाज की जिम्मेदारी और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कड़वी सच्चाई

बिभास साहा का मामला हम सभी को यह सोचने पर मजबूर करता है कि असफलता के दौर में किसी युवा को केवल डिग्रियों और नौकरी के तराजू पर तौलना कितना खतरनाक हो सकता है। आज के समय में करियर की अंधी दौड़ में युवाओं पर जिस प्रकार का सामाजिक दबाव बनाया जाता है, वह उन्हें अवसाद के मुहाने पर धकेल देता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिभास को समय रहते सही मानसिक परामर्श (Counseling) और परिवार व समाज का भावनात्मक संबल मिला होता, तो शायद उसकी यह हालत न होती। यह कहानी एक सबक है कि हमें अपने आसपास के उन युवाओं की सुध लेनी होगी जो असफलता के दौर से गुजर रहे हैं, इससे पहले कि कोई और बिभास अपनी मानसिक दुनिया को हमेशा के लिए खो दे।