लोकतंत्र में अलग-अलग राय होना बेहद सामान्य बात है’, आयोग ने अपने सभी फैसलों को बताया पारदर्शी

लोकतंत्र में अलग-अलग राय होना बेहद सामान्य बात है’, आयोग ने अपने सभी फैसलों को बताया पारदर्शी

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और राजनीतिक गलियारों से इस वक्त एक बहुत ही महत्वपूर्ण और बड़ी खबर सामने आ रही है। देश में पिछले कुछ समय से चल रहे विशेष समेकित और मतदाता पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े विभिन्न विवादों, राजनीतिक दलों की आपत्तियों और मीडिया में उठ रहे सवालों पर आखिरकार देश के सर्वोच्च चुनाव निकाय यानी निर्वाचन आयोग (Election Commission of India - ECI) ने अपनी चुप्पी तोड़ दी है। आयोग ने एक आधिकारिक और स्पष्ट बयान जारी करते हुए यह दो टूक कहा है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर काम करते समय या बड़े नीतिगत फैसले लेते समय अलग-अलग विचारों और राय का होना पूरी तरह से सामान्य बात है। इसके साथ ही चुनाव आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि आयोग द्वारा लिए गए सभी महत्वपूर्ण निर्णय किसी एक व्यक्ति के इशारे पर नहीं बल्कि पूरी तरह से सर्वसम्मत (Unanimous) और संविधान के दायरे में रहकर लिए गए हैं। इस विशेष रिपोर्ट के माध्यम से हम विस्तार से जानेंगे कि एसआईआर (SIR) विवाद को लेकर आयोग का यह स्पष्टीकरण क्यों जरूरी था, इससे राजनीतिक दलों के आरोपों पर क्या विराम लगेगा और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर इसके क्या प्रभाव पड़ने वाले हैं।

क्या है पूरा SIR विवाद और क्यों गरमाई हुई है देश की चुनावी सियासत?

हाल के दिनों में देश के विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और एसआईआर (Special Integrated Revision / SIR) की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग और विभिन्न विपक्षी राजनीतिक दलों के बीच लगातार तनातनी देखने को मिल रही है। विपक्षी दलों का यह आरोप रहा है कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई जा रही इन नई प्रक्रियाओं और नियमों के कारण कई वैध मतदाताओं के नाम सूची से कटने का खतरा पैदा हो रहा है और इस पर आयोग के भीतर भी पूरी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। राजनीतिक दलों और कुछ पूर्व नौकरशाहों द्वारा उठाए गए इन सवालों ने सार्वजनिक चर्चाओं को जन्म दे दिया था, जिससे निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगी थीं। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर जब इस प्रकार के सवाल उठते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश की लोकतांत्रिक साख और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर डालते हैं, यही वजह है कि आयोग के लिए इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करना बेहद आवश्यक हो गया था।

चुनाव आयोग का दो टूक जवाब: ‘अलग-अलग राय होना लोकतंत्र की खूबसूरती और सामान्य प्रक्रिया है’

निर्वाचन आयोग ने अपने आधिकारिक बयान में यह स्पष्ट किया है कि भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे लोकतंत्र में जब निर्वाचन संबंधी इतने बड़े और जटिल फैसले लिए जाते हैं, तो आयोग के सदस्यों और अधिकारियों के बीच वैचारिक चर्चाएं, विभिन्न दृष्टिकोण और अलग-अलग राय सामने आना एक अत्यंत स्वाभाविक और सामान्य प्रक्रिया है। आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न तर्कों और चर्चाओं के बाद ही अंततः एक सर्वसम्मत और मजबूत निर्णय पर पहुंचा जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच के आंतरिक विचार-विमर्श को लेकर जिस प्रकार की राजनीतिक बयानबाजी और कयासबाजी का दौर चल रहा था, उस पर विराम लगाते हुए आयोग ने यह साबित कर दिया है कि उसका हर एक कदम देश के संविधान और कानून के प्रति पूरी तरह समर्पित है। आयोग ने यह भी दोहराया कि पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव कराना ही उसका एकमात्र और सर्वोच्च लक्ष्य है, और इस कार्य में किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव या राजनीतिक आरोपों से उसकी प्रतिबद्धता प्रभावित नहीं होती है।

फैसलों को बताया पूरी तरह सर्वसम्मत, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर दिया जोर

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि एसआईआर (SIR) से जुड़े फैसलों पर आयोग के भीतर मतभेद हैं और सभी सदस्य एकमत नहीं हैं। इन सभी अटकलों का खंडन करते हुए निर्वाचन आयोग ने यह स्पष्ट किया कि आयोग द्वारा लिए गए सभी निर्णय सामूहिक सहमति और सर्वसम्मत आधार पर ही किए जाते हैं। निर्वाचन आयोग ने पारदर्शी शासन का संदेश देते हुए कहा कि कोई भी नागरिक या राजनीतिक दल नियमों के तहत किसी भी प्रक्रिया की समीक्षा कर सकता है, लेकिन संस्था की निष्पक्षता पर आधारहीन सवाल उठाना उचित नहीं है। आयोग ने यह भी आश्वस्त किया कि आगामी चुनावों और मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण का यह अभियान पूरी तरह से निष्पक्ष, त्रुटिहीन और कानून सम्मत तरीके से पूरा किया जाएगा, ताकि देश के हर एक पात्र मतदाता को अपने मताधिकार का प्रयोग करने में किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं और लोकतंत्र की मजबूती के लिए भविष्य की राह

चुनाव आयोग के इस स्पष्टीकरण के बाद देश के राजनीतिक दलों की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सत्ता पक्ष ने आयोग के इस बयान का स्वागत करते हुए कहा है कि विपक्ष को हर बात पर संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को ठेס पहुंचाने की आदत छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि चुनाव आयोग हमेशा से अपनी निष्पक्षता के लिए दुनिया भर में मिसाल रहा है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों का कहना है कि वे लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए सवाल पूछते रहेंगे और आयोग से यह उम्मीद करते हैं कि वह हर स्तर पर पूरी तरह पारदर्शी बना रहे। बहरहाल, एसआईआर विवाद पर चुनाव आयोग के इस दो टूक जवाब ने यह साबित कर दिया है कि संवैधानिक संस्थाएं राजनीतिक दबावों के आगे झुकने के बजाय अपने नियमों और संविधान के अनुसार काम करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। देश के मतदाता इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं, और आने वाले दिनों में निष्पक्ष चुनाव ही इस बहस का सबसे बड़ा उत्तर साबित होंगे।