'मैं आपके सामने माथा टेक रहा हूं...' जब सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत के सामने भावुक हुआ बुजुर्ग, मुख्य न्यायाधीश ने दिया यह दिल जीतने वाला जवाब

'मैं आपके सामने माथा टेक रहा हूं...' जब सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत के सामने भावुक हुआ बुजुर्ग, मुख्य न्यायाधीश ने दिया यह दिल जीतने वाला जवाब

देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में अक्सर कई दिलचस्प और भावुक कर देने वाले नजारे देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक अनोखा वाकया बुधवार को देखने को मिला, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अदालत में एक बुजुर्ग याचिकाकर्ता बेहद भावुक हो गए। अपनी याचिका पर सुनवाई की गुहार लगाते हुए बुजुर्ग ने कोर्ट रूम में ही सीजेआई के सामने हाथ जोड़कर माथा टेक दिया। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने बेहद संवेदनशीलता और सतर्कता से जवाब देते हुए बुजुर्ग को एक खास सलाह दी और बताया कि न्यायपालिका की अपनी कुछ सीमाएं क्यों होती हैं।

गुरुद्वारे के फंड से जुड़ा था मामला, बुजुर्ग की गुहार पर सीजेआई ने समझाया कानून

यह पूरा मामला देश की गुरुद्वारा समितियों में होने वाले कथित फंड के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा हुआ था। इसी मुद्दे को लेकर एक बुजुर्ग याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अदालत की कार्यवाही के दौरान जब याचिका पर विचार किया जा रहा था, तब बुजुर्ग ने भावुक होकर सीजेआई से कहा कि मैं आपके सामने माथा टेक रहा हूं, कृपया मेरी इस याचिका को स्वीकार कर इस पर नोटिस जारी कर दीजिए।

इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बुजुर्ग याचिकाकर्ता को बड़े ही आदर के साथ समझाया कि वे उनकी चिंताओं को समझते हैं, लेकिन इस मामले में जो सुधार वे चाहते हैं, उसके लिए देश के कानून में बड़े संशोधन की आवश्यकता होगी। सीजेआई ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह कोर्ट हमेशा आपके लिए ही खुला है, आप जब मर्जी यहां आ सकते हैं। लेकिन जहां तक कानून बदलने का सवाल है, वह काम संसद का है। सीजेआई ने बुजुर्ग को सलाह दी कि वे इसके लिए संसद की 'याचिका समिति' (Committee on Petitions) के पास जाएं।

धर्म के मामले में दखल नहीं देना चाहती अदालत, सीजेआई ने जताई चिंता

मुख्य न्यायाधीश ने इस दौरान न्यायपालिका और धर्म के बीच की बारीक लकीर का भी विशेष जिक्र किया। उन्होंने बेहद सतर्क रुख अपनाते हुए कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में सीधे तौर पर कोई आदेश पारित करता है या कोई फैसला लेता है, तो समाज में यह संदेश जा सकता है कि अदालत धार्मिक मामलों में अनुचित दखल दे रही है। इससे देश में एक नई बहस और विवाद खड़ा होने की आशंका बढ़ सकती है, इसलिए ऐसे नीतिगत मामलों को संसद के जरिए ही सुलझाया जाना सबसे सही और संवैधानिक तरीका है।

टेट्रा पैक और पाउच में बिकने वाली शराब पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब

इसी दिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने एक और बेहद गंभीर और जनहित से जुड़ा मामला सामने आया। सीजेआई सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की तीन जजों की खंडपीठ ने टेट्रा पैक और प्लास्टिक के पाउच में बेची जा रही शराब पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की। 'कम्युनिटी अगेंस्ट ड्रंकन ड्राइविंग' नामक एक सामाजिक संगठन द्वारा दायर इस जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन नायर ने एक बेहद चौंकाने वाला तर्क पेश किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान आबकारी नियमों में 'बोतल' की परिभाषा बेहद अस्पष्ट है, जिसका फायदा उठाकर कंपनियां फलों के जूस की तरह टेट्रा पैक और पाउच में शराब बेच रही हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि इन पैकेटों के ऊपर सेब या अन्य फलों की तस्वीरें छपी होती हैं, लेकिन उनके अंदर असल में वोडका या अन्य नशीले पदार्थ होते हैं। इससे आम नागरिकों, विशेषकर बच्चों और युवाओं में भारी भ्रम फैल रहा है, जो उनके स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खिलवाड़ है।

कांच की बोतलों तक सीमित हो शराब की बिक्री, देश भर में एक समान नीति की मांग

अधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि देश के नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा करना पूरी तरह से सरकार का दायित्व है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह केंद्र सरकार को एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश दे, जो देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर समान रूप से लागू हो। इस नीति के तहत टेट्रा पैक और पाउच जैसी पैकेजिंग में शराब की बिक्री पर तुरंत और पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

इसके अलावा, याचिका में यह भी मांग की गई है कि सभी राज्यों को अपने संबंधित आबकारी कानूनों और नियमों में आवश्यक संशोधन करने के निर्देश दिए जाएं। इसके तहत 'बोतल' की एक ऐसी स्पष्ट परिभाषा तय की जानी चाहिए, जिससे शराब की पैकेजिंग को केवल कांच की बोतलों या पूरी तरह से पारदर्शी कंटेनरों तक ही सीमित किया जा सके, ताकि बाहर से ही यह साफ देखा जा सके कि अंदर क्या मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर सरकार के जवाब के बाद आगे की सुनवाई करेगा।

 

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