हिंद-प्रशांत में शांति और स्थिरता के लिए भारत-आसियान सहयोग जरूरी

हिंद-प्रशांत में शांति और स्थिरता के लिए भारत-आसियान सहयोग जरूरी

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, वैश्विक सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक यानी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भू-राजनीतिक पटल से इस वक्त एक बहुत बड़ी, ऐतिहासिक और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। लाओस की राजधानी वियंतियान में आयोजित 11वीं आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस (ADMM-Plus) में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग और व्यापारिक गलियारे यानी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा रक्षा मंत्र जारी किया है। अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वैश्विक आर्थिक समृद्धि, निर्बाध समुद्री आवाजाही और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत और आसियान (ASEAN) देशों के बीच रक्षा एवं रणनीतिक सहयोग का मजबूत होना बेहद अनिवार्य है। उन्होंने किसी भी देश का नाम लिए बिना यह साफ संदेश दे दिया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी भी एक शक्ति का एकतरफा प्रभुत्व या विस्तारवादी नीतियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी और इस पूरे क्षेत्र को 'फ्री, ओपन और रूल्स-बेस्ड' यानी मुक्त, खुला और नियम-आधारित बनाए रखने के लिए सभी मित्र देशों को एकजुट होकर काम करना होगा।

विस्तारवादी ताकतों को सीधा संदेश: समुद्री कानून और संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCLOS) के पालन पर भारत का जोर

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन के दौरान 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए यह दोहराया कि सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय संधियों और समुद्री सीमाओं की संप्रभुता का पूरा सम्मान करना चाहिए। दक्षिण चीन सागर (South China Sea) और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव और क्षेत्रीय दावों के बीच भारत का यह बयान कूटनीतिक दृष्टिकोण से बेहद दूरगामी माना जा रहा है। राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि भारत हमेशा से ही विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और संवाद का समर्थक रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी की जाए। आसियान देशों के साथ भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) और 'सागर' (SAGAR - Security and Growth for All in the Region) विज़न को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अपने पड़ोसियों की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और समुद्री डकैती, अवैध शिकार व मानवीय आपदाओं से निपटने के लिए हर संभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है।

आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसी साझा चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग का आह्वान

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने केवल पारंपरिक सैन्य खतरों ही नहीं, बल्कि गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों (Non-Traditional Security Threats) जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, साइबर हमले, फर्जी खबरों के जरिए फैलाए जाने वाले दुष्प्रचार और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली आपदाओं पर भी गहरी चिंता जताई। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज की इस जटिल और एक-दूसरे से जुड़ी दुनिया में कोई भी देश अकेले इन खतरों का सामना नहीं कर सकता। भारत और आसियान देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यासों, सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान, रक्षा औद्योगिक साझेदारी और नौसैनिक गश्त को बढ़ाकर ही इन खतरों का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सकता है। उन्होंने एडीएमएम-प्लस (ADMM-Plus) मंच को इस दिशा में एक अत्यंत प्रभावी माध्यम बताया जो सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

वैश्विक शांति और शक्ति संतुलन में भारत-आसियान धुरी की नई भूमिका, रक्षा क्षेत्र में भारत का बढ़ता प्रभाव

राजनाथ सिंह का यह रक्षा मंत्र इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब वैश्विक सुरक्षा वार्ताओं में केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक अग्रणी नीति-निर्माता और सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) के रूप में उभर चुका है। भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता, जैसे आधुनिक युद्धपोत, मिसाइल प्रणाली और रक्षा प्रौद्योगिकियों ने आसियान देशों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। भारत और आसियान के बीच गहराता यह रक्षा संबंध न केवल हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और सुरक्षा का माहौल बनाए रखेगा, बल्कि किसी भी तरह की विस्तारवादी सोच को रोकने में एक मजबूत दीवार का काम करेगा। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और रक्षा रणनीतिकार राजनाथ सिंह के इस बयान को हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भविष्य के लिए एक युगांतरकारी दिशा-निर्देश के रूप में देख रहे हैं।