कश्मीरी पंडित चले गए, मंदिर वीरान हुए; इस मुस्लिम शख्स ने 36 साल तक संभाले 111 मंदिर

कश्मीरी पंडित चले गए, मंदिर वीरान हुए; इस मुस्लिम शख्स ने 36 साल तक संभाले 111 मंदिर

जम्मू-कश्मीर में 1990 के दशक के उस दौर में जब आतंकवाद अपने चरम पर था और घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ, कई ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिरों के कपाट बंद हो गए थे।

ऐसे खौफनाक दौर में बडगाम जिले के चरार-ए-शरीफ निवासी जहूर अहमद दार ने घाटी के हिंदू धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और देखभाल का बीड़ा उठाया। सांप्रदायिक सौहार्द और कश्मीरियत की अद्वितीय मिसाल पेश करते हुए जहूर अहमद ने उस दौर से लेकर अब तक पूरे कश्मीर में 111 से अधिक मंदिरों की लगातार निगरानी और देखरेख की है।

वीरान पड़े धार्मिक स्थलों को दी नई जिंदगी

'नेशनल सोशलिस्ट लीग ऑफ इंडिया' से जुड़े जहूर अहमद दार बताते हैं कि 90 के दशक में पंडितों के घाटी छोड़ने के बाद मंदिरों की सार-संभाल करने वाला कोई नहीं बचा था। देखरेख के अभाव में लगभग 75 फीसदी मंदिर पूरी तरह जर्जर हालत में पहुंच गए थे।

ऐसे में उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अनंतनाग, हंदवाड़ा, पुलवामा और श्रीनगर के अलग-अलग कोनों में जाकर वीरान पड़े मंदिरों की स्थिति का जायजा लेना शुरू किया। श्रीनगर का प्रसिद्ध ज्येष्ठा देवी मंदिर, राजभवन के समीप स्थित मंदिर और हंदवाड़ा का भद्रकाली मंदिर उन प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं, जिनकी देखभाल में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।

जान का खतरा, फिर भी चुपचाप निभाते रहे फर्ज

उस दौर में यह काम किसी बड़े खतरे से कम नहीं था। जहूर अहमद बताते हैं कि आतंकवाद के साए में किसी को अपने इस मिशन की भनक तक नहीं लगने दी। अगर कोई रास्ते में पूछता भी था, तो वे कोई घरेलू काम बताकर आगे बढ़ जाते थे। उन्हें लगातार यह अंदेशा रहता था कि कोई उनका पीछा न कर रहा हो। इस जोखिम भरे काम में उन्हें अपने साथी एम.के. पंडिता का भी पूरा सहयोग मिला, जो एक ट्रस्ट के प्रभारी थे। दोनों ने आपसी समझ और भाईचारे से काम बांट रखा था—एम.के. पंडिता पंडित समुदाय की ओर से और जहूर मुस्लिम समुदाय की ओर से दोनों संस्कृतियों के इस साझा ताने-बाने को टूटने से बचाते रहे।

36 साल बाद गूंजीं घंटियां, शीतलनाथ मंदिर का लौटा गौरव

श्रीनगर के हब्बा कदल और लाल चौक सहित अन्य इलाकों के मंदिरों में वे सुबह-शाम चक्कर लगाते थे। हाल ही में श्रीनगर के ऐतिहासिक शीतलनाथ मंदिर में जब 36 वर्षों बाद हवन-पूजन हुआ और घंटों की आवाज गूंजी, तो उस भावुक पल के गवाह जहूर अहमद भी बने। 90 के दशक में इस मंदिर को सहेजने वाले जहूर ने अब इसका प्रबंधन संबंधित समुदाय को सौंप दिया है। उन्होंने कहा कि जब खंडहर में तब्दील हो चुके मंदिरों को दोबारा सजते, फूलों से महकते और वहां पूजा-अर्चना होते देखते हैं, तो दिल को रूहानी सुकून मिलता है।

'अल्लाह ने मुझे इस काम के लिए चुना'

इतने लंबे समय तक बिना किसी स्वार्थ और प्रचार के यह सेवा करने की शक्ति उन्हें कहां से मिली, इस पर जहूर अहमद का कहना है कि यह सब ऊपर वाले की कृपा थी। वे कहते हैं कि हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सब एक हैं और कश्मीर की धरती पर हर धार्मिक स्थल उतना ही मुकद्दस है। इंसान की नीयत अच्छी हो तो ईश्वर खुद रास्ता दिखाता है। उनका मानना है कि उन्हें अल्लाह ने इस खास मकसद के लिए चुना था, जिसे वे पूरी ईमानदारी और अकीदत के साथ निभाते रहे।