एक गलती और सलाखों के पीछे! वोटर आईडी दोबारा बनवाने से क्यों कांप रहे हैं लाखों नागरिक? सामने आया चौंकाने वाला सच

एक गलती और सलाखों के पीछे! वोटर आईडी दोबारा बनवाने से क्यों कांप रहे हैं लाखों नागरिक? सामने आया चौंकाने वाला सच

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान मतदाता सूची से बाहर हुए वैध वोटरों को अपना नाम वापस जुड़वाने में एक अजीबोगरीब कानूनी पेंच का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव आयोग की ओर से दोबारा नाम दर्ज कराने की सुविधा देने के बावजूद लोग कानूनी पचड़े और जेल की सजा के डर से आगे नहीं आ रहे हैं। इस जमीनी संकट को देखते हुए महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय ने भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को एक अहम प्रस्ताव भेजकर 'फॉर्म 6' के प्रारूप में तत्काल बदलाव की सिफारिश की है।

असल अड़चन फॉर्म 6 की भाषा और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों में है। निर्वाचन आयोग ने उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छूटे हुए मतदाताओं को शामिल करने के लिए 29 सितंबर से विशेष अभियान शुरू किया था जहां एसआईआर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसके लिए वोटरों से फॉर्म 6 भरवाने का निर्देश दिया गया था। लेकिन फॉर्म 6 मूल रूप से 'नए मतदाताओं' के लिए है, जिसमें आवेदक को यह घोषणा करनी पड़ती है कि वह पहली बार वोटर लिस्ट में नाम दर्ज करा रहा है।

यहीं से कानूनी संकट खड़ा होता है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत निर्वाचन संबंधी फॉर्म में झूठा हलफनामा या गलत जानकारी देने पर एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का सख्त प्रावधान है। ऐसे में जो लोग पहले से पंजीकृत थे और प्रशासनिक त्रुटि या एसआईआर के चलते उनका नाम कटा, वे झूठी घोषणा करने से झिझक रहे हैं। उन्हें डर है कि 'पहली बार आवेदन' पर टिक करने से उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। जमीनी स्तर पर चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को भी लोगों को यह फॉर्म भरवाने में भारी विरोध और असहयोग झेलना पड़ रहा है।

इस गतिरोध को सुलझाने के लिए महाराष्ट्र चुनाव कार्यालय ने आयोग को स्पष्ट सुझाव दिए हैं। प्रस्ताव के तहत फॉर्म 6 के शीर्षक से 'नए मतदाता' शब्द को हटाने की मांग की गई है। इसके साथ ही एक नया खंड जोड़ने की वकालत की गई है, जिससे पहले किसी विधानसभा में पंजीकृत रहे लेकिन अब सूची से बाहर हुए मतदाता अपनी सही स्थिति बता सकें। इसके अतिरिक्त, आवेदकों को अपना पुराना वोटर आईडी कार्ड (ईपीआईसी नंबर) दर्ज करने का स्पष्ट विकल्प देने की भी सिफारिश की गई है।

हालांकि, फॉर्म 6 जैसे वैधानिक दस्तावेज में किसी भी तरह के फेरबदल के लिए केंद्र सरकार को 'मतदाता पंजीकरण नियम, 1960' में संशोधन करना अनिवार्य होता है। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू इस पर पहले ही साफ कर चुके हैं कि वैधानिक नियमों में संशोधन के बिना फॉर्म के प्रारूप से छेड़छाड़ अमान्य मानी जाएगी। यह पूरा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक भी पहुंच चुका है, जहां मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ दिल्ली और अन्य राज्यों में फॉर्म 6 के उपयोग से उपजे असमंजस पर सुनवाई कर रही है। शीर्ष अदालत ने संकेत दिया है कि आम वोटरों के अधिकारों की रक्षा के लिए जल्द ही जरूरी न्यायिक दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं।