आलू की खेती से होगी बढ़िया कमाई, खेत तैयार करने से बीज उपचार तक, एक्सपर्ट से जानें टिप्स
उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा समेत भारत के मैदानी इलाकों में रबी सीजन की शुरुआत होते ही आलू की खेती को लेकर किसानों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। आलू केवल भारतीय रसोई का मुख्य हिस्सा ही नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी नकदी फसल (Cash Crop) भी है जो कम समय में किसानों को लागत से कई गुना अधिक मुनाफा देने की क्षमता रखती है। हालांकि, बाजार में अच्छी कीमत पाने और खेत में आलू की रिकॉर्ड पैदावार हासिल करने के लिए सही वैज्ञानिक तरीकों का पालन करना बेहद अनिवार्य है। कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि किसान भाई खेत की वैज्ञानिक तरीके से तैयारी, उन्नत किस्मों के चयन और रोपाई से पूर्व बीजों के सही उपचार (Seed Treatment) पर ध्यान दें, तो प्रति एकड़ फसल की लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है और गुणवत्तापूर्ण आलू का बंपर उत्पादन हासिल किया जा सकता है।
खेत की सही तैयारी और मिट्टी का चुनाव: बंपर उपज हासिल करने का पहला मुख्य कदम
आलू की बेहतर और गुणवत्तापूर्ण फसल के लिए बलुई दोमट (Sandy Loam) या हल्की दोमट मिट्टी को सबसे उत्तम माना जाता है, जिसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था हो। मिट्टी का pH मान 5.5 से 6.5 के बीच होना पौधों के विकास और कंदों (Tubers) के सही आकार के लिए बेहद अनुकूल रहता है। खेत की तैयारी शुरू करते समय सबसे पहले पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से गहराई से करनी चाहिए ताकि पुरानी फसल के अवशेष और हानिकारक कीट-रोग नष्ट हो जाएं। इसके बाद 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर या रोटावेटर से करके मिट्टी को पूरी तरह से भुरभुरी और समतल बना लेना चाहिए। आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ लगभग 8 से 10 टन अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) या वर्मीकंपोस्ट मिट्टी में मिला देना चाहिए, जिससे मिट्टी की संरचना सुधरती है और कंदों का आकार तेजी से बढ़ता है।
आलू की टॉप उन्नत किस्में जिनका चयन करके किसान पा सकते हैं रिकॉर्ड पैदावार
अधिक मुनाफा कमाने के लिए बाजार की मांग और क्षेत्र की जलवायु के अनुसार आलू की सही किस्मों का चुनाव करना सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) द्वारा विकसित की गई 'कुफरी ख्याति', 'कुफरी पुखराज' और 'कुफरी बहार' जैसी अगेती और मध्यम अवधि की किस्में बहुत लोकप्रिय हैं जो मात्र 75 से 90 दिनों में तैयार हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त प्रसंस्करण यानी चिप्स बनाने वाली कंपनियों के लिए 'कुफरी चिपसोना-1', 'कुफरी चिपसोना-3' और 'कुफरी फ्रायसोना' जैसी किस्मों की मांग काफी अधिक रहती है, जिससे किसानों को सीधा कंपनियों से अनुबंध करके प्रीमियम भाव मिल जाता है। इन उन्नत किस्मों की विशेषता यह है कि इनमें रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है और प्रति हेक्टेयर 300 से 400 क्विंटल तक का शानदार उत्पादन प्राप्त होता है।
आलू बीजों का सही उपचार और बीजोपचार की वैज्ञानिक विधि जो बचाएगी बीमारियों से
आलू की बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि बीज जनित बीमारियों (Seed-borne diseases) जैसे कि कंद गलन (Tuber Rot), अगेती झुलसा और चेचक (Scab) के कारण 30 से 40 प्रतिशत तक फसल नष्ट होने का खतरा बना रहता है। बीजोपचार के लिए कोल्ड स्टोरेज से निकाले गए बीज के टुकड़ों को कम से कम 24 घंटे छायादार जगह पर रखें ताकि उनका तापमान सामान्य हो सके। इसके बाद प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम कारबेन्डाजिम या मैनकोजेब मिलाकर बीजों को 10 से 15 मिनट तक घोल में डुबोकर रखना चाहिए। इसके साथ ही जैविक तरीके से उपचार करने के लिए ट्राइकोडेर्मा विरिडी (Trichoderma viride) 5 ग्राम प्रति लीटर पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। उपचारित बीजों को छाया में सुखाने के बाद ही खेत में रोपाई के लिए ले जाना चाहिए, जिससे अंकुरण दर 95 प्रतिशत से अधिक मिलती है।
सही उर्वरक प्रबंधन, बुवाई का तरीका और समय पर सिंचाई से मिलेगी मनचाही सफलता
आलू की बुवाई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। खाद और उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करते हुए प्रति एकड़ नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की संस्तुत मात्रा का ही उपयोग करना चाहिए, जिसमें पोटाश का प्रयोग कंदों की चमक और आकार बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है। पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद या 7 से 10 दिनों के भीतर हल्की करनी चाहिए, यह ध्यान रखते हुए कि मेड़ों पर पानी ऊपर तक न चढ़े। इसके बाद फसल में मिट्टी चढ़ाने (Earthing Up) का कार्य 30 से 35 दिनों के भीतर पूरा कर लेना चाहिए। सही समय पर संतुलित खाद, सिंचाई और कीट नियंत्रण अपनाकर किसान भाई आलू की खेती से बेहद कम समय में लाखों का मुनाफा कमा सकते हैं।