पर्चा खारिज, फिर भी बन गया सरपंच! बाड़मेर के इस अनोखे चुनाव का सच जान चकरा जाएगा आपका सिर
राजस्थान के बाड़मेर जिले से चुनावी व्यवस्था की भारी चूक का एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया है, जिसने राज्य निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गडरा रोड ग्राम पंचायत में सरपंच पद के एक ऐसे प्रत्याशी ने जीत हासिल कर ली, जिसका पर्चा जांच के दौरान ही रद्द कर दिया गया था। नामांकन निरस्त होने के बावजूद न केवल मतपत्र (बैलेट पेपर) पर उनका नाम और चुनाव चिह्न दर्ज रहा, बल्कि मतदाताओं ने उन्हें चुनकर सरपंच भी बना दिया। अब इस अप्रत्याशित जीत के बाद पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।
मामला गडरा रोड पंचायत के चुनाव से जुड़ा है, जहां पूराराम नाम के प्रत्याशी ने सरपंच पद के लिए दावेदारी पेश की थी। 23 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की पड़ताल के दौरान अधिकारियों ने पाया कि पूराराम ने अपने हलफनामे में आपराधिक इतिहास और दोषसिद्धि से जुड़ी अनिवार्य जानकारी अधूरी छोड़ी है। इसके चलते निर्वाचन नियमों के तहत उनका पर्चा खारिज कर दिया गया और बाकायदा नोटिस बोर्ड पर चस्पा की गई रिजेक्टेड लिस्ट में उनका नाम भी दर्ज किया गया। लेकिन असली गड़बड़ी मतदान के दिन उजागर हुई, जब मतपत्र पर पूराराम का नाम और आवंटित चुनाव निशान दोनों जस के तस मौजूद मिले।
मतगणना हुई तो पूराराम को कुल 1786 वोट हासिल हुए और उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी कुलदीप सिंह को 187 मतों के अंतर से शिकस्त देकर विजय पताका फहरा दी। जीत की घोषणा होते ही विरोधी खेमे ने धांधली का आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया। पराजित प्रत्याशी कुलदीप सिंह के भाई भरत सिंह ने इसे चुनाव अधिकारियों की खुली मिलीभगत या घोर लापरवाही करार देते हुए जिला निर्वाचन अधिकारी से परिणाम तत्काल रद्द करने की गुहार लगाई है। वहीं दूसरी तरफ, नवनिर्वाचित सरपंच पूराराम का दावा है कि पीठासीन अधिकारी ने उन्हें बाकायदा वैध तरीके से चुनाव चिह्न सौंपा था और जनता ने उन्हें स्पष्ट जनादेश दिया है, इसलिए विरोधी केवल अफवाहें फैला रहे हैं।
इस अजीबोगरीब मामले के तूल पकड़ते ही बाड़मेर जिला कलेक्टर चिन्मयी गोपाल ने पूरे घटनाक्रम की उच्चस्तरीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। स्थानीय उपखंड अधिकारी (एसडीओ) सुरेश कुमार के अनुसार, संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर से विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है कि आखिर जब नामांकन पत्र तकनीकी कमियों के कारण खारिज कर दिया गया था, तो फिर प्रत्याशी का नाम मतपत्र तक कैसे पहुंचा। निर्वाचन प्रक्रिया में हुई इस बड़ी चूक ने स्थानीय राजनीति के साथ-साथ प्रशासनिक गलियारों में भी खलबली मचा दी है।