HC के तीखे सवालों के बाद सौरव-रांका ने वापस ली याचिका
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और धरने की अनुमति न दिए जाने से जुड़े एक संवेदनशील मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में हुई सुनवाई के दौरान बेहद सख्त और तीखी टिप्पणियां देखने को मिली हैं। प्रदर्शन की अनुमति न मिलने पर अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले याचिकाकर्ता सौरव और रांका को हाईकोर्ट के कड़े रुख का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्हें अपनी याचिका वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों और उनके आचरण पर कड़ा ऐतराज जताते हुए सीधा सवाल दाग दिया कि जब आपको पहले से ही यह भली-भांति जानकारी थी कि संबंधित क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा कारणों से धरने-प्रदर्शन की अनुमति नहीं है या वह स्थान डीनोटिफाई किया जा चुका था, तो आप वहां प्रदर्शन करने पहुंचे ही क्यों? अदालत ने याचिकाकर्ताओं को सख्त लहजे में हिदायत देते हुए यहां तक कह दिया कि 'आप कोई नासमझ Gen-Z (नई पीढ़ी के युवा) नहीं हैं कि आपको देश के लागू नियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समझ न हो।' आइए विस्तार से जानते हैं कि इस पूरे मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में क्या-क्या हुआ और कोर्ट की इन तीखी टिप्पणियों के क्या कूटनीतिक व कानूनी मायने हैं।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति और प्रशासनिक पाबंदियों से जुड़ा पूरा कानूनी विवाद
मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो याचिकाकर्ता सौरव और रांका ने दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति न दिए जाने और बाद में उनके खिलाफ प्रशासनिक कदम उठाए जाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि संविधान के तहत हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाने और विरोध दर्ज कराने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, ऐसे में पुलिस द्वारा अनुमति न देना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है। हालांकि, जब मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो दिल्ली पुलिस और पुलिस प्रशासन की ओर से पेश हुए वकीलों ने कोर्ट को अवगत कराया कि जंतर-मंतर क्षेत्र में धारा 144 और सुरक्षा से जुड़े कई कड़े नियम लागू रहते हैं, ताकि लुटियंस दिल्ली के इस बेहद संवेदनशील इलाके में यातायात, वीआईपी मूवमेंट और आम लोगों की दिनचर्या में कोई बड़ा व्यवधान न पैदा हो।
दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ के तीखे सवाल, कानून का पालन न करने पर कोर्ट ने लगाई फटकार
सुनवाई के दौरान जब हाईकोर्ट की पीठ ने मामले के तथ्यों का बारीकी से अवलोकन किया, तो याचिकाकर्ताओं की दलीलों में कई कानूनी खामियां पाई गईं। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार असीमित नहीं हो सकता और यह हमेशा कानून-व्यवस्था तथा देश की सार्वजनिक सुरक्षा के नियमों के अधीन ही आता है। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि 'जब यह क्षेत्र डीनोटिफाई था और आपको पता था कि वहां बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी प्रकार का एकत्रीकरण मना है, तो आप वहां क्यों गए?' अदालत ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि जिम्मेदार नागरिकों को कानून और व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आप कोई नासमझ Gen-Z नहीं हैं जिन्हें सही और गलत तथा कानूनी प्रक्रियाओं का अंतर न मालूम हो। कोर्ट के इस सख्त और आक्रामक रुख को देखते हुए याचिकाकर्ताओं के पास कोई मजबूत कानूनी दलील नहीं बची।
याचिका वापस लेने की मजबूरी और अदालती टिप्पणियों के दूरगामी संदेश
हाईकोर्ट की ओर से याचिका खारिज किए जाने या भारी जुर्माना लगाए जाने की संभावना को देखते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। पीठ ने याचिका वापस लेने की अर्जी को स्वीकार करते हुए मामले को नस्तीबद्ध (Dismissed as withdrawn) कर दिया। कानून के जानकारों का मानना है कि दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में विरोध प्रदर्शनों, सार्वजनिक स्थलों के उपयोग और नागरिक कर्तव्यों से जुड़े मामलों में एक बड़ा नजीर साबित होगी। अदालत ने साफ कर दिया है कि अपनी मांगों को रखने के लिए हर नागरिक और संगठन को तय प्रशासनिक गाइडलाइंस और कानूनी रास्तों का पालन करना अनिवार्य होगा। बिना अनुमति के सार्वजनिक स्थलों पर व्यवधान पैदा करने और फिर अदालत का सहारा लेकर राहत पाने की परिपाटी को अब न्यायपालिका द्वारा किसी भी स्थिति में प्रोत्साहन नहीं दिया जाएगा।