जंतर-मंतर को प्रदर्शन और धरने की सूची से हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

जंतर-मंतर को प्रदर्शन और धरने की सूची से हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

देश की राजधानी नई दिल्ली का 'जंतर-मंतर' (Jantar Mantar) ऐतिहासिक रूप से देश के कोने-कोने से आने वाले किसानों, युवाओं, बेरोजगारों, राजनीतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अपनी आवाज बुलंद करने का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय केंद्र रहा है। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाने के अधिकार का एक बड़ा प्रतीक माने जाने वाले इस स्थल को लेकर हाल ही में एक ऐसा बड़ा प्रशासनिक निर्णय सामने आया जिसने राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी। दिल्ली प्रशासन और संबंधित प्राधिकरणों द्वारा जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को औपचारिक नोटिस जारी कर दिया है तथा उनसे यह स्पष्ट जवाब मांगा है कि आखिर किस आधार पर लोकतंत्र के इस पारंपरिक धरना स्थल को सूची से हटाया गया है।

आखिर क्यों हटाया गया जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से?

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में जंतर-मंतर के आसपास के इलाके में आवासीय और व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने तथा स्थानीय नागरिकों व दुकानदारों द्वारा यातायात बाधित होने और शोर-शराबे की लगातार शिकायतों के बाद प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था का हवाला देते हुए यहाँ धरने-प्रदर्शनों पर कड़े प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया शुरू की थी। अधिकारियों का तर्क था कि राष्ट्रीय राजधानी के इस वीवीआईपी और संवेदनशील जोन में लगातार होने वाले प्रदर्शनों के कारण आम जनता और ट्रैफिक व्यवस्था को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। हालांकि, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार को इस तरह से सीमित करना सीधे तौर पर संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) पर अंकुश लगाने जैसा है। इसी असमंजस और प्रशासनिक पाबंदियों के खिलाफ मामला सीधे सर्वोच्च न्यायालय की देहरी तक जा पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: लोकतांत्रिक अधिकारों और व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी

मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि देश की राजधानी में नागरिकों के लिए अपनी आवाज उठाने की जगहों को लगातार सीमित क्यों किया जा रहा है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोकतंत्र में असहमति दर्ज कराना और सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है, और इसे पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। हालांकि, न्यायालय ने यह भी माना कि सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इसलिए दोनों पक्षों के बीच एक उचित संतुलन बनाया जाना आवश्यक है। इसी संतुलन को साधने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर निर्देश दिया है कि वे जल्द से जल्द अपना जवाब दाखिल करें कि वे वैकल्पिक व्यवस्था के तहत प्रदर्शनकारियों के लिए कौन से स्थान तय कर रहे हैं।

वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों और पुलिस के रवैये पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल

प्रशासन द्वारा जंतर-मंतर और रामलीला मैदान जैसे पारंपरिक स्थलों पर धरने की अनुमति को जटिल बनाने के बाद दिल्ली के बाहरी इलाकों जैसे बुराड़ी या रामलीला मैदान के दूरदराज हिस्सों को ही प्रदर्शन के लिए अधिकृत करने का प्रयास किया गया है। लेकिन विरोध प्रदर्शन करने वाले संगठनों का तर्क है कि यदि प्रदर्शनकारियों को शहर के मुख्य केंद्रों से मीलों दूर धकेल दिया जाएगा, तो उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक कभी नहीं पहुंच पाएगी। सुप्रीम कोर्ट अब इस बात की भी समीक्षा कर रहा है कि क्या प्रशासन द्वारा बनाए गए नए नियम और दिशा-निर्देश नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं कर रहे हैं। अदालत यह भी जानना चाहती है कि क्या बिना किसी ठोस और पारदर्शी नीति के लोकतांत्रिक स्थलों को बंद किया जा रहा है या इसके पीछे कोई सुनियोजित प्रशासनिक रणनीति काम कर रही है।

देश भर की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के आगामी फैसले पर टिकीं

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किए जाने के बाद से यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है। देश के विभिन्न मानवाधिकार संगठनों, वकीलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि इससे नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा हो सकेगी। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस आगामी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या हलफनामा पेश करती हैं और अदालत इस संवेदनशील मसले पर क्या ऐतिहासिक फैसला सुनाती है। जंतर-मंतर के अस्तित्व और उसके भविष्य से जुड़ा यह फैसला आने वाले समय में देश भर के प्रदर्शन स्थलों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होने वाला है।