30 साल पुरानी वो परीक्षा धांधली! जब एक पेपर लीक कांड ने धर्मेंद्र प्रधान को बना दिया था छात्र राजनीति का 'सिकंदर'
आज जब देश में परीक्षाओं और पेपर लीक को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान विपक्ष और छात्रों के निशाने पर हैं, तब इतिहास के पन्नों से एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला किस्सा बाहर आया है। राजनीति के गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि धर्मेंद्र प्रधान की राजनीति की शुरुआत भी आज से करीब 30 साल पहले ओडिशा में हुए एक बड़े पेपर लीक कांड और छात्र आंदोलन से ही हुई थी। जिस धांधली के खिलाफ लड़कर वे एक साधारण छात्र से छात्र नेता (Student Leader) बने और संसद तक पहुंचे, आज संयोग देखिए कि उसी विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए वे खुद परीक्षा प्रणालियों के सबसे बड़े संकट का सामना कर रहे हैं।
1990 का दशक: उत्कल यूनिवर्सिटी का वो ऐतिहासिक आंदोलन
यह किस्सा 1990 के दशक की शुरुआत का है, जब धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा की प्रतिष्ठित उत्कल यूनिवर्सिटी (Utkal University) में पढ़ाई कर रहे थे। उस दौरान यूनिवर्सिटी की एक मुख्य परीक्षा का पेपर लीक हो गया था, जिससे हजारों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया था। परीक्षा प्रणाली में फैले भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही को देखकर आम छात्रों में भारी आक्रोश था। इसी गुस्से को एक दिशा देने के लिए धर्मेंद्र प्रधान आगे आए। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के बैनर तले इस धांधली के खिलाफ एक बड़े और उग्र छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया।
जब छात्र नेता बनकर उभरे धर्मेंद्र प्रधान
इस आंदोलन के दौरान धर्मेंद्र प्रधान ने वाइस चांसलर के दफ्तर का घेराव करने से लेकर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने तक, हर मोर्चे पर छात्रों की आवाज बुलंद की। उनकी बेबाक बयानबाजी, गजब की नेतृत्व क्षमता और छात्रों को एकजुट करने की कला ने उन्हें रातों-रात उत्कल यूनिवर्सिटी का सबसे बड़ा और लोकप्रिय चेहरा बना दिया। इस आंदोलन की सफलता का नतीजा यह हुआ कि 1985 में एबवीपी में शामिल होने के बाद, वे 1993 में उत्कल यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष (President) चुने गए। यह उनकी राजनीतिक पारी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट था।
छात्र राजनीति से केंद्रीय कैबिनेट तक का सफर
उत्कल यूनिवर्सिटी से शुरू हुआ यह सफर थमा नहीं। इसके बाद धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा भाजपा के युवा मोर्चे के अध्यक्ष बने और फिर साल 2000 में पहली बार पल्लाहड़ा सीट से विधायक चुनकर ओडिशा विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति का रुख किया और लोकसभा तथा राज्यसभा सांसद बनते हुए केंद्र सरकार में पेट्रोलियम मंत्रालय और अब शिक्षा मंत्रालय जैसे बेहद महत्वपूर्ण विभागों की कमान संभाली।
अतीत और वर्तमान का अजीब संयोग
आज जब वे खुद देश के शिक्षा मंत्री हैं और नीट (NEET) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं के पेपर लीक और धांधली के मामलों को लेकर घिरे हुए हैं, तो उनका यह 30 साल पुराना इतिहास सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में फिर से जिंदा हो गया है। विश्लेषकों का कहना है कि जो नेता खुद एक पेपर लीक विरोधी आंदोलन की भट्टी में तपकर राजनेता बना हो, आज उसी के कंधों पर देश की पूरी परीक्षा प्रणाली को इस कलंक से मुक्त कराने और करोड़ों युवाओं का भरोसा जीतने की सबसे बड़ी चुनौती है।