47 साल बाद ऐसा क्या हुआ जिससे सीआरपीएफ का पूरा गेम बदल गया?

47 साल बाद ऐसा क्या हुआ जिससे सीआरपीएफ का पूरा गेम बदल गया?

भारतीय आंतरिक सुरक्षा और अर्धसैनिक बलों के इतिहास में एक ऐसा ऐतिहासिक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है, जिसने देश के सबसे बड़े सुरक्षा बल यानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की रणनीति और साख को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। पिछले 47 वर्षों से देश के बस्तर और सुदूर नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों के लिए एक अभेद्य किला बने दुर्गम क्षेत्रों में सीआरपीएफ ने आखिरकार वह कर दिखाया जिसकी कल्पना शायद दशकों पहले किसी ने नहीं की थी। दशकों तक वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) के साये में जीने वाले और सुरक्षा बलों के लिए 'नो-गो जोन' (No-Go Zone) माने जाने वाले इलाकों में सुरक्षा कैंपों की स्थापना और आधुनिक रणनीतिक बदलाव ने इस खूनी खेल का पूरा पासा ही पलट कर रख दिया है। आइए जानते हैं कि आखिर वो कौन से बड़े बदलाव और कड़े कदम रहे, जिन्होंने पिछले 47 सालों के इतिहास को पीछे छोड़ते हुए सीआरपीएफ की इस जंग का पूरा गेम ही बदल दिया।

47 साल पुराना इतिहास और वामपंथी उग्रवाद का वह खौफनाक दौर

लगभग चार दशक पहले यानी 1970 और 1980 के दशक के उस दौर को याद कीजिए जब छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के घने जंगलों में नक्सलियों ने अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर रखी थी। उस समय देश के कई इलाकों में सीआरपीएफ और अन्य सुरक्षा बलों के लिए ऑपरेशन चलाना किसी अचूक चुनौती से कम नहीं था। बारूदी सुरंगों (Landmines), आईईडी (IED) धमाकों और घात लगाकर किए जाने वाले हमलों के कारण सुरक्षा बलों को भारी जानमाल का नुकसान उठाना पड़ता था। लगातार दशकों तक यह संघर्ष चलता रहा और इन दुर्गम वनों में सुरक्षा बलों के कदम रखना तक असंभव माना जाता था, जिसके चलते इसे सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक अंतहीन और कठिन जंग माना जाने लगा था।

गेमचेंजर साबित हुई फॉरवर्ड ऑपरेटिंग कैंप्स (Forward Operating Bases) की रणनीति

इन 47 वर्षों में ऐसा क्या बदला जिसने इस पूरी बाजी को पलट दिया? सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा श्रेय सीआरपीएफ और केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा अपनाई गई नई 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' (FOB) रणनीति को जाता है। पहले सुरक्षा बल कैंपों से निकलकर लंबे ऑपरेशन के लिए जंगलों में जाते थे और फिर वापस लौट आते थे, जिसका फायदा नक्सली उठाते थे। लेकिन हाल के वर्षों में सीआरपीएफ ने नक्सलियों के गढ़ के ठीक बीचों-बीच, अतिसंवेदनशील और दूरदराज के इलाकों में लगातार नए फॉरवर्ड कैंप स्थापित करना शुरू कर दिया। जब बल सीधे माओवादियों के केंद्र में जाकर स्थायी रूप से तैनात हो गए, तो नक्सलियों की आपूर्ति श्रृंखला, उनके सुरक्षित ठिकाने और उनकी कमांड चेन पूरी तरह से तहस-नहस हो गई।

आधुनिक तकनीक, ड्रोन सर्विलांस और खुफिया तंत्र का अभूतपूर्व तालमेल

केवल जमीन पर तैनाती ही नहीं, बल्कि इस बार सीआरपीएफ के गेम बदलने के पीछे आधुनिक तकनीक का बहुत बड़ा योगदान रहा है। बल ने अपनी रणनीतिक कार्यप्रणाली में अत्याधुनिक ड्रोन कैमरों, सैटेलाइट इमेजरी, नाइट विजन डिवाइसेस और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू किया। इसके अलावा, स्थानीय आदिवासियों का विश्वास जीतने के लिए चलाए गए कल्याणकारी अभियानों और मजबूत स्थानीय खुफिया तंत्र (Intelligence Network) ने सुरक्षा बलों की राह को बेहद आसान बना दिया। अब नक्सलियों की हर एक गतिविधि की पुख्ता जानकारी पहले ही सुरक्षा बलों के पास पहुंच जाती है, जिससे वे बिना किसी अनहोनी के सटीक और निर्णायक स्ट्राइक करने में पूरी तरह कामयाब हो रहे हैं।

बस्तर और दंडकारण्य के इलाकों में सिमटता दायरा और नक्सलियों का समर्पण

कभी वामपंथी उग्रवाद का गढ़ कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे घने जंगलों में अब नक्सलियों का प्रभाव तेजी से सिमटता जा रहा है। पिछले कुछ महीनों के दौरान चलाए गए सुनियोजित अभियानों के बाद सैकड़ों की संख्या में खूंखार नक्सलियों ने या तो सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है या फिर उन्हें मार गिराया गया है। जो इलाके कभी सुरक्षा बलों के लिए मौत का कुआं माने जाते थे, आज वहां तिरंगा शान से लहरा रहा है और पक्की सड़कें, स्कूल तथा अस्पताल बनने लगे हैं। सरकार की पुनर्वास नीतियों और विकास कार्यों ने नक्सलियों के वैचारिक भ्रम को भी पूरी तरह से तोड़कर रख दिया है।

नए भारत की आंतरिक सुरक्षा और भविष्य का संदेश

47 साल बाद सीआरपीएफ द्वारा हासिल की गई यह अभूतपूर्व सफलता इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जब दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, आधुनिक सैन्य तकनीक और हमारे वीर जवानों का अदम्य साहस आपस में मिल जाता है, तो देश के सामने मौजूद हर बड़ी चुनौती का सफाया हो जाता है। वामपंथी उग्रवाद के खात्मे की ओर बढ़ता यह कदम भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। आने वाले कुछ ही वर्षों में भारत का यह क्षेत्र पूरी तरह से नक्सल मुक्त होकर देश के मुख्य विकास धारा से जुड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है, जिसने यह साबित कर दिया है कि राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता के आगे कोई भी ताकत टिक नहीं सकती।