कौन थीं आदिवासी नेत्री निशा भगत? बेंगलुरु की नौकरी छोड़ जल-जंगल-जमीन और सरना धर्म कोड की लड़ाई में उतरीं
झारखंड की वीर माटी और आदिवासी समुदाय के अधिकारों की बुलंद आवाज रहीं प्रखर आदिवासी नेत्री निशा भगत का नाम राज्य के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया है। अपनी बेहतरीन प्रतिभा और उच्च शिक्षा के दम पर आईटी हब बेंगलुरु की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में बेहद शानदार पैकेज वाली नौकरी हासिल करने के बावजूद, निशा भगत का मन कभी कॉर्पोरेट की बंद कमरों की चकाचौंध में नहीं रमा। अपने लोगों की पीड़ा, जल-जंगल-जमीन पर मंडराते खतरे और आदिवासी पहचान के अस्तित्व की लड़ाई को देखकर उन्होंने अपनी चमचमाती कॉर्पोरेट लाइफ को अलविदा कह दिया और सीधे जमीनी संघर्ष के मैदान में कूद पड़ीं। गुमला और पूरे छोटानागपुर पठार की गलियों से लेकर राजधानी रांची की सड़कों तक, निशा भगत ने सरना धर्म कोड और आदिवासियों के अधिकारों के लिए जो मशाल जलाई, वह आज भी लाखों युवाओं को प्रेरित कर रही है।
बेंगलुरु की चमचमाती नौकरी छोड़ गांव लौटने की पूरी कहानी: जब कॉर्पोरेट करियर पर भारी पड़ा अपनी माटी का कर्ज
निशा भगत का शुरुआती जीवन काफी होनहार और प्रेरणादायी रहा। झारखंड के ग्रामीण इलाके से निकलकर उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और अपनी योग्यता के बल पर बेंगलुरु में एक बड़ी कंपनी में बतौर कॉर्पोरेट पेशेवर अपने करियर की शुरुआत की। लेकिन जब भी वे छुट्टियों में अपने पैतृक गांव और गुमला के आदिवासी इलाकों में आती थीं, तो अपने समुदाय के लोगों को जल, जंगल और जमीन के अधिकारों से वंचित, विस्थापित और उपेक्षित देखकर उनका दिल दहल जाता था। आखिरकार उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा और साहसिक फैसला लिया। उन्होंने अपनी लाखों के पैकेज वाली नौकरी से इस्तीफा दे दिया और हमेशा के लिए अपने गांव लौट आईं। उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों के हक, सीएनटी-एसपीटी एक्ट की रक्षा और जल-जंगल-जमीन के संरक्षण के लिए समर्पित करने का प्रण ले लिया।
'सरना धर्म कोड' की मांग और जल-जंगल-जमीन के आंदोलन की सबसे बुलंद महिला चेहरा
झारखंड में सरना धर्म कोड को अलग धार्मिक पहचान के रूप में मान्यता दिलाने के आंदोलन में निशा भगत की भूमिका सबसे अग्रिम पंक्ति के नेताओं में रही। उनका मानना था कि आदिवासियों की अलग सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक पहचान है, जिसे जनगणना और संवैधानिक अभिलेखों में 'सरना कोड' के जरिए दर्ज किया जाना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, उन्होंने कॉर्पोरेट कंपनियों और अवैध खनन से आदिवासियों की जमीनों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर जनजागरण अभियान चलाए। गांव-गांव घूमकर उन्होंने आदिवासी महिलाओं और युवाओं को एकजुट किया। अपनी बेबाक वाकपटुता, तार्किक शैली और अंग्रेजी तथा स्थानीय भाषाओं पर समान पकड़ होने के कारण वे जल्द ही दिल्ली से लेकर रांची तक आदिवासी आंदोलन की सबसे मुखर और प्रभावशाली युवा महिला चेहरा बनकर उभरीं।
गुमला विधानसभा क्षेत्र से लड़ा था चुनाव: चुनावी राजनीति के जरिए अधिकारों की आवाज बनने की कोशिश
सामाजिक आंदोलनों में अपनी मजबूत पकड़ बनाने के बाद निशा भगत ने यह महसूस किया कि नीति-निर्माण और विधानसभा के पटल पर आदिवासियों की आवाज को मजबूती से उठाने के लिए राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनना जरूरी है। इसी विजन के साथ उन्होंने झारखंड के गुमला (Gumla) विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया था। गुमला की जनता के बीच उन्होंने न केवल जनसंपर्क किया, बल्कि अपने जमीनी मुद्दों जैसे स्थानीय नियोजन नीति, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और वनाधिकार कानून को अपने चुनावी एजेंडे का सबसे मुख्य हिस्सा बनाया। हालांकि चुनावी राजनीति के समीकरण पेचीदा रहे, लेकिन गुमला से उनके चुनावी अभियान ने यह साबित कर दिया कि एक पढ़ी-लिखी और जागरूक आदिवासी महिला भी पारंपरिक राजनीति को सीधी चुनौती दे सकती है।
आदिवासी महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा पुंज बनीं स्वर्गीय निशा भगत की अमर विरासत
निशा भगत का पूरा जीवन संघर्ष, त्याग और अपनी माटी के प्रति अनन्य प्रेम का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने यह साबित करके दिखाया कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल व्यक्तिगत धन और आराम कमाना नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़कर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों की आवाज बनना है। आज भी जब झारखंड में सरना धर्म कोड की गूंज सुनाई देती है या जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए ढोल-नगाड़े बजते हैं, तो स्वर्गीय निशा भगत का योगदान हर आदिवासी के जेहन में तरोताजा हो जाता है। उनकी संघर्षपूर्ण जीवन गाथा आज पूरे देश के युवाओं, विशेषकर आदिवासी समुदाय की बेटियों को अपनी पहचान पर गर्व करने और अधिकारों के लिए निडर होकर लड़ने की असीम ताकत देती है।