आप विधायक बलकार सिद्धू और पूर्व मंत्री सिकंदर मलूका सरेआम भिड़े

आप विधायक बलकार सिद्धू और पूर्व मंत्री सिकंदर मलूका सरेआम भिड़े

पंजाब के राजनीतिक गलियारों और स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था से इस वक्त एक बहुत ही सनसनीखेज, गरमागरम और चौकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे राज्य के सियासी तापमान को अचानक काफी बढ़ा दिया है। पंजाब के बठिंडा जिले के अंतर्गत आने वाले मलूका गांव में उस वक्त अफरा-तफरी और भारी हंगामा मच गया जब आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक बलकार सिद्धू और अकाली दल के दिग्गज नेता तथा पूर्व मंत्री सिकंदर सिंह मलूका एक सरकारी हाजिरी रजिस्टर (Attendance Register) के मुद्दे पर आमने-सामने आ गए। दोनों नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक और बहस इतनी बढ़ गई कि वहां मौजूद समर्थक और स्थानीय ग्रामीण भी सकते में आ गए। विकास कार्यों, सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति और स्थानीय प्रशासन पर वर्चस्व को लेकर हुई इस भिड़ंत ने पंजाब की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। इस विशेष, विस्तृत और इनसाइड रिपोर्ट के माध्यम से हम गहराई से जानेंगे कि आखिर यह हाजिरी रजिस्टर विवाद क्या है, दोनों दिग्गजों के बीच क्या-क्या तीखी बातें हुईं और इस घटना के बाद स्थानीय सियासत में किस तरह के नए समीकरण बनते नजर आ रहे हैं।

क्या है पूरा 'हाजिरी रजिस्टर विवाद'? जानिए क्यों मलूका पंचायत में भड़का सियासी संग्राम

किसी भी ग्रामीण इलाके में पंचायत कार्यालय और सरकारी स्कूलों या संस्थानों में कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज करने वाला हाजिरी रजिस्टर प्रशासनिक कामकाज का एक बहुत ही महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। लेकिन मलूका गांव में इस रजिस्टर को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब स्थानीय स्तर पर चल रहे विकास कार्यों और सरकारी मुलाजिमों की कार्यप्रणाली की जांच को लेकर तनातनी बढ़ गई। आरोप है कि स्थानीय स्तर पर लंबे समय से प्रशासनिक व्यवस्था में मनमानी चल रही थी, जिसे सुधारने के लिए जनप्रतिनिधियों की दखलअंदाजी शुरू हुई। जब 'आप' विधायक बलकार सिद्धू ने अपने दौरे के दौरान इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए दस्तावेजों और रजिस्टरों की जांच करनी चाही, तो मामला पूरी तरह से गरमा गया। स्थानीय राजनीति में अपनी गहरी पकड़ रखने वाले पूर्व मंत्री सिकंदर मलूका के समर्थकों ने इसका कड़ा विरोध किया, जिसके बाद यह पूरा प्रशासनिक मुद्दा दो सियासी दिग्गजों के बीच की खुली जंग में तब्दील हो गया।

आम आदमी पार्टी के विधायक बलकार सिद्धू और पूर्व मंत्री सिकंदर मलूका का आमना-सामना

घटना के समय जब 'आप' विधायक बलकार सिद्धू मलूका पंचायत परिसर में पहुंचे, तो वहां का माहौल पहले से ही काफी तनावपूर्ण था। जैसे ही हाजिरी रजिस्टर और प्रशासनिक कामकाज को लेकर बातचीत शुरू हुई, दोनों पक्षों के सुर ऊंचे होने लगे। विधायक बलकार सिद्धू का यह कहना था कि जनता ने उन्हें भ्रष्टाचार को खत्म करने और पारदर्शी शासन देने के लिए चुना है, इसलिए सरकारी कार्यालयों में कागजों और रजिस्टरों की हेराफेरी कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दूसरी ओर, अकाली दल के वरिष्ठ नेता सिकंदर सिंह मलूका, जो उस क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास में एक बहुत बड़ा नाम माने जाते हैं, उन्होंने विधायक के इस अंदाज और कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया। मलूका और उनके समर्थकों ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के विधायक अपनी ताकत का दुरुपयोग करके स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव बना रहे हैं, जिसे ग्रामीण सहन नहीं करेंगे।

मलूका पंचायत में गरमागरम बहस और भारी हंगामा: देखते ही देखते भिड़ गए दोनों पक्षों के समर्थक

बहस के दौरान दोनों नेताओं के बीच शब्दों के तीर इतने तीखे थे कि वहां मौजूद समर्थकों के बीच भी धक्का-मुक्की और नारेबाजी शुरू हो गई। मलूका पंचायत भवन परिसर अखाड़े में तब्दील हो गया, जहां एक तरफ 'आप' विधायक के समर्थन में नारे लग रहे थे, तो दूसरी तरफ अकाली दल के कार्यकर्ता पूर्व मंत्री के पक्ष में डटे हुए थे। स्थिति को बिगड़ता देख वहां मौजूद स्थानीय पुलिस प्रशासन और सुरक्षाकर्मियों के हाथ-पांव फूल गए। पुलिस ने तुरंत बीच-बचाव करते हुए दोनों पक्षों को अलग करने की कोशिश की ताकि बात किसी बड़े खूनी संघर्ष या हिंसक झड़प तक न पहुंचे। गनीमत यह रही कि समय रहते पुलिस अधिकारियों ने स्थिति को संभाल लिया, वरना बठिंडा की इस पंचायत में सियासत का यह टकराव एक बहुत बड़े कानूनी और कानून-व्यवस्था के संकट में बदल सकता था।

पंजाब की राजनीति पर इसके क्या होंगे दूरगामी असर? आगामी चुनावों से पहले गरमाया माहौल

इस हाई-वोल्टेज ड्रामे और भिड़ंत ने पंजाब की राजनीति में यह साबित कर दिया है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मैदानी स्तर पर संघर्ष कितना आक्रामक हो चुका है। एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी अपनी प्रशासनिक कसावट और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा कर रही है, वहीं अकाली दल और अन्य विपक्षी दल इसे सत्ता का घमंड और सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करार दे रहे हैं। सिकंदर मलूका जैसे मंजे हुए राजनेता के साथ इस तरह का सीधा टकराव यह इशारा करता है कि आने वाले दिनों में पंजाब के ग्रामीण इलाकों में राजनीतिक सरगर्मी और अधिक तेज होने वाली है। मलूका पंचायत का यह हाजिरी रजिस्टर विवाद अब केवल एक पंचायत का मामला नहीं रहा, बल्कि यह पंजाब की राज्य राजनीति का एक बहुत बड़ा और चर्चा का विषय बन गया है, जिस पर हर राजनीतिक विश्लेषक की पैनी नजर टिकी हुई है।