असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल सिंह को मिली बड़ी मानवीय राहत
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत असम की कड़ी सुरक्षा वाली डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल में लंबे समय से कैद खालिस्तान समर्थक और खडूर साहिब लोकसभा सीट से सांसद अमृतपाल सिंह से जुड़ी एक बड़ी और मानवीय राहत भरी खबर पंजाब के अमृतसर से सामने आ रही है। अमृतपाल सिंह के वकीलों द्वारा अदालत में दाखिल की गई एक विशेष अर्جی पर सुनवाई करते हुए अमृतसर की एक स्थानीय अदालत ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह कैदी को उसकी गंभीर रूप से बीमार और बुजुर्ग दादी से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात करने की अनुमति दे। पिछले काफी समय से जेल की सलाखों के पीछे बंद होने के कारण अमृतपाल अपने परिवार और पैतृक गांव से पूरी तरह कटे हुए थे, ऐसे में परिवार की तरफ से उनकी बुजुर्ग दादी की नाजुक सेहत का हवाला देते हुए अदालत से यह गुहार लगाई गई थी कि उन्हें कम से कम वीडियो कॉल के माध्यम से अपनी दादी का हालचाल जानने की इजाजत दी जाए। अदालत के इस संवेदनशील और मानवीय फैसले के बाद कानूनी हलकों और राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि भले ही अमृतपाल पर देश की सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोप हैं और वे कड़े कानूनों के तहत जेल में बंद हैं, लेकिन अदालत ने मानवीय आधार पर इस मामले में एक संतुलित और संजीदा रुख अपनाया है।
क्या है पूरा मामला और क्यों कोर्ट में लगानी पड़ी वीडियो कॉल की गु अर्जी?
अमृतपाल सिंह के परिवार के करीबी सूत्रों और उनके कानूनी सलाहकारों ने कुछ दिन पहले अदालत को यह बताया था कि अमृतपाल की दादी की उम्र बहुत अधिक हो चुकी है और वे इस समय जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं तथा गंभीर बीमारियों से जूझ रही हैं। परिवार की अंतिम इच्छा यह थी कि अपने पोते को एक बार देखने की उनकी दिली ख्वाहिश को पूरा किया जाए, लेकिन असम के डिब्रूगढ़ और पंजाब की भौगोलिक दूरी तथा सुरक्षा कारणों से उनका जेल जाकर मिलना किसी भी सूरत में संभव नहीं था। इस गंभीर और भावनात्मक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अमृतपाल के वकीलों ने अमृतसर की अदालत में एक औपचारिक याचिका दायर कर यह मांग की थी कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए उन्हें वीडियो कॉल के जरिए अपनी बीमार दादी से बात करने की अनुमति दी जाए। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और जेल प्रशासन की सुरक्षा संबंधी रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करने के बाद यह पाया कि कानून के दायरे में रहते हुए मानवीय संवेदनाओं का सम्मान करना भी न्यायपालिका का एक अहम कर्तव्य है, जिसके तहत यह विशेष आदेश जारी किया गया है।
10 मिनट की होगी बातचीत, डिब्रूगढ़ जेल और पंजाब पुलिस के कड़े पहरे में होगी प्रक्रिया
अमृतसर कोर्ट के इस स्पष्ट आदेश के बाद अब डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल के अधिकारियों को यह औपचारिकता पूरी करनी होगी कि वे जेल परिसर के भीतर ही किसी सुरक्षित और अधिकृत कंप्यूटर या स्क्रीन के जरिए अमृतपाल सिंह की उनकी बुजुर्ग दादी से वीडियो कॉल करवाएं। इस बातचीत की कुल अवधि सिर्फ 10 मिनट तय की गई है, जिसके दौरान जेल प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और सुरक्षाकर्मी पूरी तरह से मुस्तैद रहकर इस बात की निगरानी करेंगे कि बातचीत केवल पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी विषयों तक ही सीमित रहे। इस तरह की हाई-सिक्योरिटी जेलों में बंद कैदियों के लिए इंटरनेट या वीडियो कॉलिंग जैसी सुविधाएं आमतौर पर प्रतिबंधित होती हैं और इसके लिए विशेष अदालती आदेशों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए यह प्रक्रिया बेहद गोपनीय और कड़े सुरक्षा घेरे के बीच पूरी की जाएगी। जेल मैनुअल और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पूरा पालन करते हुए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि इस तकनीकी सुविधा का किसी भी अन्य रूप में दुरुपयोग न हो सके, और तय समय सीमा यानी 10 मिनट पूरे होते ही वीडियो लिंक को तुरंत डिस्कनेक्ट कर दिया जाएगा।
राजनीतिक हलकों और समर्थकों के बीच चर्चा का विषय बना अदालत का यह संवेदनशील निर्णय
अमृतपाल सिंह को वीडियो कॉल की अनुमति मिलने की यह खबर जैसे ही सार्वजनिक हुई, पंजाब के राजनीतिक गलियारों और उनके समर्थकों के बीच यह चर्चा का एक बड़ा विषय बन गया है। एक तरफ जहां उनके समर्थकों और परिवार ने अदालत के इस मानवीय फैसले का स्वागत किया है और इसे एक बड़ी राहत बताया है, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि भारतीय न्यायपालिका की यह खूबी है कि वह कठोर कानूनों के बीच भी मानवाधिकारों और मानवीय संवेदनाओं का पूरा ख्याल रखती है। सांसद के रूप में चुने जाने के बाद से ही अमृतपाल की कानूनी लड़ाइयां और उनकी हिरासत के मामले लगातार सुर्खियों में रहे हैं, और हर छोटे-बड़े घटनाक्रम पर देश भर की नजरें टिकी रहती हैं। अब देखना यह है कि इस 10 मिनट की वीडियो कॉल के दौरान परिवार और अमृतपाल के बीच क्या बातचीत होती है और आने वाले दिनों में उनकी कानूनी पेचीदगियों से जुड़े मामलों में अदालत का अगला रुख क्या रहता है।