कागजों पर विकास, धरातल पर सन्नाटा: 200 करोड़ के प्रोजेक्ट मंजूर होकर भी टेंडर और आवंटन में अटके; अब लापरवाह अफसरों की तय होगी जवाबदेही

कागजों पर विकास, धरातल पर सन्नाटा: 200 करोड़ के प्रोजेक्ट मंजूर होकर भी टेंडर और आवंटन में अटके; अब लापरवाह अफसरों की तय होगी जवाबदेही

सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे और जनसुविधाओं को बेहतर बनाने के दावों के बीच प्रशासनिक लेटलतीफी का एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। विभिन्न विकास योजनाओं के तहत क्षेत्र में कुल 200 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की वित्तीय और प्रशासनिक मंजूरी (Approval) तो महीनों पहले मिल चुकी है, लेकिन धरातल पर काम शुरू होना तो दूर, ज्यादातर फाइलें अभी भी टेंडर और आवंटन (Tender & Allotment) के मकड़जाल में फंसी हुई हैं। इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और लालफीताशाही के चलते आम जनता को विकास कार्यों का लाभ नहीं मिल पा रहा है। मामला उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद अब शासन ने कड़ा रुख अपनाया है और संबंधित विभागों के गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की तैयारी शुरू कर दी है।

फाइलों में दबे 200 करोड़ के काम; सड़क, पानी और बिजली के प्रोजेक्ट्स अधर में

विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस भारी-भरकम बजट में से अधिकांश राशि मुख्य सड़कों के चौड़ीकरण, पेयजल आपूर्ति लाइनों को दुरुस्त करने, ग्रामीण इलाकों में बिजली के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नए सामुदायिक भवनों के निर्माण के लिए आवंटित की गई थी। आम जनता की जरूरतों को देखते हुए कैबिनेट और वित्त विभाग ने इन सभी कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर हरी झंडी दे दी थी। लेकिन मंजूरी के बाद जब इन कामों को अमलीजामा पहनाने की बारी आई, तो विभागीय अधिकारियों की सुस्ती के कारण महीनों तक टेंडर की शर्तें ही तय नहीं हो सकीं और कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स तकनीकी खामियों की वजह से अधर में लटक गए।

आखिर कहां फंसा पेंच? टेंडर प्रक्रिया और ठेकेदारों की खींचतान ने बढ़ाई देरी

प्रशासनिक शिथिलता की इनसाइड स्टोरी: जांच में यह बात सामने आई है कि 200 करोड़ रुपये के इन प्रोजेक्ट्स में से 60 प्रतिशत से अधिक कार्य केवल इसलिए शुरू नहीं हो पाए क्योंकि विभागों द्वारा समय पर 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (RFP) जारी नहीं किया गया। कुछ मामलों में टेंडर तो जारी हुए, लेकिन ठेकेदारों (Contractors) के आपसी गठजोड़ और पुलिंग के चलते सिंगल टेंडर की स्थिति पैदा हो गई, जिसे नियमानुसार रद्द करना पड़ा। वहीं, कई बड़े कामों में आवंटन पत्र (Allotment Letter) जारी होने के बाद भी ठेकेदारों ने कार्य स्थल पर काम शुरू करने में रुचि नहीं दिखाई और संबंधित इंजीनियरों ने उन पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की।

लेटलतीफी पर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव सख्त, जारी हुआ 'शो-कॉज' नोटिस

इस लेटलतीफी के कारण विकास की रफ्तार थमने और बजटीय आवंटन के लैप्स (निष्प्रभावी) होने के खतरे को देखते हुए मुख्य सचिव कार्यालय ने सभी संबंधित विभागों के प्रमुखों की एक आपातकालीन समीक्षा बैठक बुलाई है। शासन ने कड़ा निर्देश जारी करते हुए कहा है कि जिन परियोजनाओं के टेंडर एक निश्चित समय सीमा के भीतर आवंटित नहीं किए गए हैं, उनके लिए जिम्मेदार लोक निर्माण विभाग (PWD), जल निगम और बिजली बोर्ड के अधिशासी अभियंताओं (EE) को 'कारण बताओ नोटिस' (Show-Cause Notice) जारी किया जाए। अधिकारियों को साफ चेतावनी दी गई है कि यदि 15 दिनों के भीतर प्रक्रिया पूरी कर काम शुरू नहीं कराया गया, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ प्रतिकूल प्रविष्टि (Adverse Entry) भी दी जाएगी।

जनता में भारी निराशा, अटकी फाइलों से बढ़ी योजना की निर्माण लागत

दूसरी तरफ, इन स्वीकृत कार्यों के जमीन पर न उतरने से स्थानीय जनप्रतिनिधियों और आम जनता में गहरा रोष व्याप्त है। लोगों का कहना है कि कागजों पर करोड़ों की घोषणाएं कर दी जाती हैं, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही के कारण जनता धूल, गड्ढों और पानी की किल्लत से जूझने को मजबूर है। आर्थिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि टेंडर और आवंटन में जितनी अधिक देरी होगी, निर्माण सामग्री (Raw Material) के दाम बढ़ने के कारण प्रोजेक्ट्स की कुल लागत (Project Cost) भी उतनी ही बढ़ जाएगी, जिससे अंततः सरकारी खजाने पर ही अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। अब देखना होगा कि शासन की इस सख्ती के बाद फाइलों में बंद विकास कार्य कब तक जमीन पर नजर आते हैं।

Latest Posts