अलवर रैणी के गढ़ गांव में 21 साल की उम्र में प्रेरणा नरुका बनीं सरपंच
राजस्थान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जिले अलवर से स्थानीय राजनीति और जमीनी लोकतंत्र की तस्वीर को पूरी तरह बदल देने वाली एक बेहद खूबसूरत और प्रेरणादायक खबर सामने आ रही है। अलवर जिले की रैणी तहसील के अंतर्गत आने वाले सुदूर ग्रामीण क्षेत्र 'गढ़ गांव' में ग्राम पंचायत चुनावों के आए परिणामों ने पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मात्र 21 वर्ष की कच्ची और युवा उम्र में एमए या कॉलेज की दहलीज पर कदम रखने वाली प्रेरणा नरुका (Prerana Naruka) ने सरपंच पद के चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करके अपने गांव की नई सरपंच की कमान संभाल ली है। इतनी कम उम्र में जब युवा अपने करियर, उच्च शिक्षा या भविष्य की उधेड़बुन में उलझे रहते हैं, तब प्रेरणा ने गांव के विकास, बुजुर्गों की सेवा और महिलाओं के अधिकारों के लिए राजनीति के अखाड़े में उतरने का साहसिक फैसला किया। उनकी इस शानदार जीत ने न केवल उनके परिवार और गढ़ गांव का मान बढ़ाया है, बल्कि पूरे राजस्थान में महिला सशक्तिकरण और युवा नेतृत्व का एक नया और मजबूत पैमाना स्थापित कर दिया है।
ग्रामीण भारत में आज भी स्थानीय राजनीति और पंचायत के फैसले आमतौर पर बुजुर्गों, अनुभवी सियासतदानों या पारंपरिक दबदबे वाले लोगों के हाथों में ही सिमटे रहते हैं। ऐसे रूढ़िवादी माहौल को चीरते हुए एक युवा बेटी का सबसे कम उम्र में सरपंच की कुर्सी तक पहुंचना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अगर इरादे बुलंद हों और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो उम्र और परिस्थितियां कभी बाधा नहीं बनतीं। जैसे ही चुनाव आयोग ने गढ़ गांव के सरपंच पद के लिए प्रेरणा नरुका की जीत की आधिकारिक घोषणा की, वैसे ही पूरे गांव में दीवाली और होली जैसा उत्सव का माहौल बन गया। आइए विस्तार से जानते हैं कि प्रेरणा नरुका का यह राजनीतिक सफर कैसा रहा, उन्होंने किन चुनौतियों का सामना किया और वे अपने गांव के विकास के लिए कौन से सुनहरे सपने लेकर इस मैदान में उतरी हैं।
पारंपरिक राजनीति को पीछे छोड़ कैसे युवा सोच ने गढ़ा नया इतिहास?
गढ़ गांव में इस बार का चुनावी रण बेहद दिलचस्प और कड़ा मुकाबला वाला था। मैदान में कई अनुभवी और उम्रदराज चेहरे भी ताल ठोक रहे थे, जिन्हें स्थानीय राजनीति का लंबा तजुर्बा हासिल था। ऐसे में जब 21 साल की प्रेरणा नरुका ने अपना नामांकन दाखिल किया, तो शुरुआत में कई लोगों को यह नाम एक नए प्रयोग की तरह लगा। लेकिन प्रेरणा ने अपनी अद्भुत संवाद शैली, जनता के प्रति समर्पण और गांव की जमीनी समस्याओं की गहरी समझ के दम पर हर मतदाता का दिल जीत लिया। उन्होंने पारंपरिक रूप से चली आ रही जातिगत और गुटबाजी की राजनीति से ऊपर उठकर केवल और केवल 'विकास, शिक्षा और पारदर्शिता' को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया।
ग्रामीण इलाकों में युवा वर्ग जब पलायन करके शहरों की ओर रुख कर रहा है, तब प्रेरणा का अपनी माटी से जुड़ाव और गांव के विकास के लिए आगे आना युवाओं के लिए एक बहुत बड़ा संदेश है। उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान घर-घर जाकर महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों से संवाद किया। उन्होंने बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और महिलाओं से वादा किया कि वे उनके हर दुख-सुख में हमेशा उनके साथ खड़ी रहेंगी। जनता ने भी इस युवा बेटी के हौसले पर पूरा भरोसा जताया और रिकॉर्ड तोड़ मतदान करके उन्हें पंचायत की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा दिया।
शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी विकास हैं प्रेरणा नरुका की पहली प्राथमिकताएं
सरपंच बनने के बाद मीडिया और ग्रामीणों से बातचीत करते हुए प्रेरणा नरुका ने स्पष्ट कर दिया कि उनका मुख्य उद्देश्य गढ़ गांव को अलवर जिले की सबसे आदर्श और विकसित पंचायत बनाना है। उन्होंने कहा कि उनके गांव में आज भी कई ऐसी बुनियादी समस्याएं हैं जिनका समाधान करना बेहद जरूरी है। उनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर ग्रामीण इलाकों में उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारना, बालिकाओं के लिए स्कूल की सुविधाओं को बेहतर करना और युवाओं के लिए खेल मैदान का निर्माण कराना शामिल है। इसके अलावा, स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में गांव की स्थिति को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य उप-केंद्र की नियमित कार्यप्रणाली सुनिश्चित करना उनकी सूची में सबसे ऊपर है।
स्वच्छता अभियान, हर घर नल योजना के तहत पीने के शुद्ध पानी की निर्बाध आपूर्ति, पक्की नालियां, और गांव की टूटी-फूटी सड़कों का पुनर्निर्माण उनके एजेंडे का अहम हिस्सा हैं। प्रेरणा का मानना है कि जब तक गांव की अंतिम पंक्ति में बैठे गरीब व्यक्ति तक शासन की योजनाओं का पूरा और पारदर्शी लाभ नहीं पहुंचेगा, तब तक विकास का कोई वास्तविक मतलब नहीं है। उन्होंने अधिकारियों और प्रशासनिक अमले के साथ तालमेल बिठाकर बिना किसी भेदभाव के काम करने का संकल्प लिया है, जिससे बिचौलियों की संस्कृति को पूरी तरह से खत्म किया जा सके।
महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल: बेटियों की उड़ान से बदली गढ़ गांव की तकदीर
प्रेरणा नरुका की यह जीत केवल एक चुनाव जीतने भर की कहानी नहीं है, बल्कि यह रूढ़िवादिता और पुरुष-प्रधान समाज की उस सोच पर एक करारा प्रहार है जो अक्सर युवा लड़कियों की क्षमताओं को कम आंकती है। राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में आज भी कई जगह महिलाओं को पर्दे या चार दीवारों के भीतर सीमित रखने की कुप्रथाएं मौजूद हैं। ऐसे में, जब एक 21 साल की पढ़ी-लिखी बेटी सरपंच की कुर्सी पर बैठकर पंचायत के प्रशासनिक और वित्तीय फैसले खुद लेगी, तो यह दृश्य उन तमाम छोटी बच्चियों और युवतियों के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा बनेगा जो जीवन में कुछ बड़ा करना चाहती हैं।
गढ़ गांव की महिलाओं और माताओं का कहना है कि वे प्रेरणा को अपनी बेटी और बहन के रूप में देखती हैं, और उन्हें पूरा विश्वास है कि यह युवा बेटी उनकी समस्याओं को जिस संवेदनशीलता के साथ समझ सकती है, वैसा कोई और नहीं कर सकता। महिलाओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ प्रेरणा का स्वागत किया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे अपने कार्यकाल में इतिहास रच दें। इस जीत से आसपास की अन्य पंचायतों की महिलाओं और बेटियों में भी एक नया आत्मविश्वास जगा है कि वे भी अब समाज की मुख्यधारा का नेतृत्व कर सकती हैं।
निष्कर्ष: युवा ऊर्जा और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से संवरेगा गढ़ गांव का भविष्य
अलवर के रैणी तहसील के गढ़ गांव में 21 साल की प्रेरणा नरुका का सरपंच बनना इस बात का प्रतीक है कि देश का युवा अब अपनी किस्मत का फैसला खुद अपने हाथों में लेने के लिए तैयार है। किताबी ज्ञान को जब समाज सेवा और जमीनी हकीकत के साथ जोड़ा जाता है, तो परिवर्तन अवश्य आता है। प्रेरणा के सामने भले ही शुरुआती दौर में चुनौतियां और प्रशासनिक अड़चनें आएंगी, लेकिन उनकी लगन, ऊर्जा और जनता का समर्थन उन्हें हर बाधा को पार करने की ताकत देगा। उम्मीद यही की जाती है कि प्रेरणा नरुका का यह कार्यकाल अन्य युवाओं के लिए एक नजीर बनेगा और देश के कोने-कोने से ऐसे ही ऊर्जावान युवा नेतृत्व सामने आकर भारत के ग्रामीण तंत्र को एक नई दिशा प्रदान करेंगे।