जयपुर नगर निगम के सदन में जनप्रतिनिधि के बदले पहुंचे पति और ससुर, मचा सियासी हड़कंप

जयपुर नगर निगम के सदन में जनप्रतिनिधि के बदले पहुंचे पति और ससुर, मचा सियासी हड़कंप

लोकतंत्र की खूबसूरती और उसकी असली ताकत इस बात में निहित होती है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि सीधे तौर पर सदन में बैठकर अपने क्षेत्र की समस्याओं को रखें और उनके समाधान के लिए नीतिगत फैसले लें। लेकिन कई बार जमीनी हकीकत और प्रशासनिक नियमों के बीच ऐसे अजीबोगरीब वाकया सामने आ जाते हैं जिन्हें देखकर आम जनता के साथ-साथ अधिकारी भी हैरान रह जाते हैं। ऐसा ही एक ताजा और बेहद चौंकाने वाला मामला राजस्थान की गुलाबी नगरी यानी जयपुर नगर निगम के सदन से सामने आया है, जहां हाल ही में हुई एक महत्वपूर्ण साधारण बैठक के दौरान लोकतंत्र की मूल भावना को ताक पर रखने वाला नजारा देखने को मिला। खबर के मुताबिक, नगर निगम के सदन की कार्यवाही जब अपने पूरे शबाब पर थी और शहर के विकास कार्यों पर चर्चा चल रही थी, तब सदन के भीतर कई ऐसी कुर्सियां भरी हुई थीं जिन पर महिला पार्षदों को बैठना चाहिए था, लेकिन उन पर पार्षद महोदया के बजाय उनके पति, ससुर या अन्य पुरुष रिश्तेदार सीना ताने बैठे हुए थे। जब इस बात की भनक निगम के अधिकारियों और विपक्षी पार्षदों को लगी, तो सदन के भीतर भारी हंगामा खड़ा हो गया और इस बात पर तीखी बहस छिड़ गई कि आखिर एक निर्वाचित प्रतिनिधि के बदले उनके घर के पुरुष सदस्य सदन की पवित्र गरिमा को कैसे तार-तार कर सकते हैं।

'प्रॉक्सी पॉलिटिक्स' और पति-ससुर राज पर खड़े हुए गंभीर प्रशासनिक और कानूनी सवाल

भारतीय राजनीति में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय निकायों यानी पंचायती राज और नगर निगमों में महिलाओं के लिए एक तिहाई से लेकर पचास प्रतिशत तक सीटें आरक्षित की गई हैं, ताकि महिलाएं आगे आकर नेतृत्व संभाल सकें। लेकिन विडंबना यह है कि कई जगहों पर आज भी 'पति-प्रधान' या 'ससुर-प्रधान' सोच हावी है, जिसे आम भाषा में 'प्रॉक्सी पॉलिटिक्स' या 'प्रधान पति' संस्कृति कहा जाता है। जयपुर नगर निगम की इस हालिया बैठक में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां महिला पार्षदों को चुनाव जिताकर घर की चारदीवारी में बैठा दिया गया और उनके नाम पर निगम के फैसले लेने, टेंडर देखने और सदन की बैठकों में धौंस जमाने का पूरा जिम्मा उनके पतियों और ससुरों ने संभाल रखा है। सदन के भीतर जब यह मुद्दा गरमाया तो कई जागरूक पार्षदों ने आवाज उठाते हुए यह सवाल पूछा कि जब जनता ने किसी महिला को अपना पार्षद चुना है, तो उनके स्थान पर उनके परिवार के पुरुषों को सदन के अंदर प्रवेश किसने दिया और क्या निगम प्रशासन की मिलीभगत के बिना ऐसा होना संभव है। इस घटना ने एक बार फिर से इस राष्ट्रीय बहस को जिंदा कर दिया है कि क्या महिला आरक्षण का यह लाभ वाकई महिलाओं तक पहुंच रहा है या फिर यह केवल कागजों तक ही सीमित रहकर पुरुषों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया है।

निगम अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे सवाल, क्या बिना अनुमति के सदन में संभव है प्रवेश?

इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद जयपुर नगर निगम के सुरक्षा प्रबंधों और प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी बहुत बड़े सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। नगर निगम के सदन और वीआईपी दीर्घा में प्रवेश के लिए कड़े नियम होते हैं, बाकायदा पास बनाए जाते हैं और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती होती है, ताकि केवल अधिकृत पार्षद और अधिकारी ही सदन के भीतर अपनी बात रख सकें। ऐसे में यह सवाल सबसे बड़ा है कि जब महिला पार्षद खुद सदन में मौजूद ही नहीं थीं और घर पर आराम कर रही थीं, तो उनके पतियों और ससुरों को निगम के सुरक्षा गार्डों ने अंदर कैसे जाने दिया? क्या अधिकारियों ने आंखें मूंद रखी थीं या फिर राजनीतिक दबाव के चलते इस गैर-कानूनी और अनधिकृत प्रवेश को नजरअंदाज किया जा रहा था? विपक्षी दलों और शहर के बुद्धिजीवियों ने इस घटना को नगर निगम प्रशासन की गंभीर लापरवाही करार देते हुए मांग की है कि सीसीटीवी फुटेज की जांच की जाए और जो भी पुरुष रिश्तेदार अवैध रूप से पार्षद की कुर्सी पर बैठे थे, उनके खिलाफ तथा उन्हें अनुमति देने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

लोकतंत्र की गरिमा बचाने के लिए इस कुप्रथा पर लगाम लगाना क्यों है बेहद जरूरी?

जयपुर नगर निगम की इस घटना ने देश भर के शहरी निकायों के कामकाज पर एक गहरा सवालिया निशान छोड़ दिया है कि अगर निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि खुद सदन में आकर अपनी जनता की आवाज बुलंद नहीं करेंगी, तो लोकतंत्र का यह पवित्र मंदिर सिर्फ पतियों और ससुरों का अखाड़ा बनकर रह जाएगा। महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए जो कानून बनाए गए थे, उनकी इस तरह से धज्जियां उड़ते देखना न केवल महिला शक्ति का अपमान है बल्कि उन लाखों मतदाताओं के साथ भी विश्वासघात है जिन्होंने उम्मीद के साथ अपने वार्ड के विकास की कमान किसी महिला प्रतिनिधि को सौंपी थी। अब देखना यह है कि जयपुर नगर निगम के महापौर और राज्य सरकार इस पूरे मामले में क्या कड़े कदम उठाते हैं ताकि भविष्य में इस तरह की 'प्रॉक्सी पॉलिटिक्स' की पुनरावृत्ति न हो सके और सदन की गरिमा पूरी तरह से सुरक्षित रह सके। क्या आपको लगता है कि महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिजनों के सदन में बैठने पर पूरी तरह से कानूनी प्रतिबंध और जुर्माना लगना चाहिए?