600 करोड़ रुपये के इस मेगा मास्टर प्लान पर क्या कहते हैं ट्रैफिक एक्सपर्ट्स
आधुनिक शहरीकरण, तेजी से बढ़ती आबादी और सड़कों पर दौड़ते अनगिनत वाहनों के कारण देश के लगभग सभी महानगर ट्रैफिक जाम और प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। राजस्थान की गुलाबी नगरी यानी जयपुर भी इस संकट से अछूता नहीं है, जहां शहर के मुख्य चौराहों और व्यस्त मार्गों पर रोज लगने वाला जाम आम नागरिकों के लिए जी का जंजाल बन चुका है। इस विकट समस्या से स्थायी निजात पाने के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) ने एक बेहद महत्वाकांक्षी और क्रांतिकारी कदम उठाया है। हाल ही में शिक्षा नगरी कोटा में जिस सफल मॉडल के तहत ट्रैफिक व्यवस्था को सुगम और सिग्नल फ्री बनाया गया है, उसी तर्ज पर अब जयपुर को भी पूरी तरह 'सिग्नल फ्री सिटी' (Signal Free Jaipur Project) में बदलने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए जेडीए ने लगभग 600 करोड़ रुपये का एक भारी-भरकम मास्टर प्लान तैयार किया है, जिसके तहत शहर के प्रमुख व्यस्त इंटरसेक्शन्स पर अंडरपास, फ्लाईओवर और ग्रेड सेपरेटर बनाने का प्रस्ताव है। जैसे ही इस योजना की रूपरेखा सार्वजनिक हुई, शहरवासियों के मन में एक उम्मीद जागी है, वहीं दूसरी तरफ अर्बन प्लानिंग और ट्रैफिक एक्सपर्ट्स ने इस प्रोजेक्ट के वित्तीय और व्यावहारिक पहलुओं पर अपनी मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दी हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि जेडीए के इस 600 करोड़ के मास्टर प्लान की असल रूपरेखा क्या है और ट्रैफिक विशेषज्ञ इस पर क्या राय रखते हैं।
क्या है कोटा का वह सफल मॉडल, जिसकी तर्ज पर जयपुर में ट्रैफिक सुधारने का ताना-बाना बुना जा रहा है
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर 'कोटा मॉडल' क्या है और इसकी चर्चा देश भर में क्यों हो रही है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान के शिक्षा शहर कोटा में प्रशासन और स्थानीय निकायों ने मिलकर शहर के प्रमुख मार्गों और चौराहों को ट्रैफिक लाइटों के झंझट से मुक्त करने के लिए बड़े पैमाने पर अंडरपास, ओवरब्रिज और रिंग रोड का जाल बिछाया था। इससे वहां वाहनों को बार-बार रेड लाइट पर रुकने की जरूरत नहीं पड़ती और गाड़ियां बिना किसी बाधा के निरंतर रफ्तार से आगे निकल जाती हैं। इसी सफलता से प्रेरित होकर जयपुर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने राजधानी के उन 20 से अधिक अति-व्यस्त चौराहों को चिन्हित किया है जहाँ रोजाना पीक आवर्स (Peak Hours) के दौरान मीलों लंबा ट्रैफिक जाम लग जाता है। जेडीए के इस नए मास्टर प्लान में मुख्य रूप से शहर की लाइफलाइन माने जाने वाले रिंग रोड, टोंक रोड, अजमेर रोड, जेएलएन मार्ग और सीकर रोड के प्रमुख जंक्शनों को शामिल किया गया है, ताकि इन रास्तों पर सफर करने वाले लाखों वाहन चालकों को लाल बत्तियों पर खड़े होकर अपना कीमती समय और ईंधन बर्बाद न करना पड़े।
600 करोड़ रुपये के मास्टर प्लान के मुख्य बिंदु: अंडरपास, फ्लाईओवर और आधुनिक इंजीनियरिंग का अनूठा संगम
जेडीए द्वारा तैयार किए गए इस 600 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रस्ताव के तहत शहर के कई प्रमुख चौराहों का कायापलट किया जाना है। इस योजना के अंतर्गत केवल पारंपरिक चौराहों को चौड़ा करना ही नहीं है, बल्कि आधुनिक ट्रैफिक इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करते हुए वहां मल्टी-लेवल फ्लाईओवर, यू-टर्न डिजाइन, और भूमिगत सुरंगें (Underpasses) विकसित की जाएंगी। इसके साथ ही, इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) और ऑटोमैटिक सेंसर कैमरों को इस पूरे नेटवर्क के साथ जोड़ा जाएगा, ताकि ट्रैफिक के दबाव के हिसाब से सिग्नलों और वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित किया जा सके। जेडीए के इंजीनियरों का दावा है कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद जयपुर के भीतर प्रदूषण के स्तर में भारी कमी आएगी क्योंकि गाड़ियां एक ही रफ्तार से चलेंगी और बार-बार क्लच-ब्रेक के इस्तेमाल से होने वाले ईंधन की खपत बचेगी। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले कुछ महीनों में टेंडर प्रक्रिया पूरी कर इस पर तेजी से काम शुरू किया जाए, ताकि तय समय सीमा के भीतर राजधानीवासियों को इस जाम के झंझट से मुक्ति मिल सके।
ट्रैफिक और अर्बन प्लानिंग एक्सपर्ट्स की राय: क्या केवल फ्लाईओवर बनाने से हल हो जाएगी जयपुर की समस्या?
इस 600 करोड़ के मेगा प्रोजेक्ट पर जहाँ एक तरफ आम जनता और व्यापारी वर्ग राहत की सांस ले रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश और प्रदेश के जाने-माने अर्बन प्लानिंग और ट्रैफिक एक्सपर्ट्स ने इस योजना के व्यावहारिक पक्षों पर कुछ गंभीर सवाल और सुझाव भी सामने रखे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चौराहों पर कंक्रीट के फ्लाईओवर और अंडरपास बना देने भर से किसी शहर की ट्रैफिक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। यदि सड़कों पर चलने वाले निजी वाहनों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक परिवहन (Public Transport जैसे सिटी बसें और मेट्रो) को मजबूत नहीं किया गया, तो कुछ ही सालों में नए फ्लाईओवर भी उतने ही जाम नजर आने लगेंगे जितने कि आज चौराहे दिखते हैं। इसके अलावा, जानकारों का यह भी सुझाव है कि सड़क निर्माण के दौरान पैदल चलने वालों (Pedestrians) और साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित रास्तों, साइकिल ट्रैक और सुगम फुटपाथों का प्रावधान करना भी उतना ही जरूरी है। बहरहाल, जेडीए का यह 600 करोड़ का मास्टर प्लान जयपुर के भविष्य की तस्वीर तय करने में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इसका क्रियान्वयन पूरी पारदर्शिता और दूरदर्शिता के साथ किया जाए।