एक सपने ने बदल दी राजा इंद्रसेन की जिंदगी, पितरों की मुक्ति के लिए किया ये व्रत
सनातन संस्कृति और पौराणिक कथाओं के पन्नों में कई ऐसे चमत्कारी प्रसंग और व्रतों का उल्लेख मिलता है जो न केवल मनुष्य के इस लोक को सुधारते हैं, बल्कि परलोक और पितरों की मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। ऐसी ही एक बेहद प्रेरणादायक और आध्यात्मिक कथा माहिष्मती नगरी के प्रतापी राजा इंद्रसेन (King Indrasen) की है। राजा इंद्रसेन का जीवन वैभव, ऐश्वर्य और राजपाट से परिपूर्ण था, लेकिन उनके मन में एक असीम वेदना और बेचैनी हमेशा बनी रहती थी। एक रात उनके जीवन में ऐसा अनोखा और रहस्यमयी स्वप्न आया जिसने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल कर रख दी। उस एक सपने ने उन्हें यह अहसास कराया कि भले ही इंसान इस धरती पर कितना भी राजा क्यों न हो, यदि उसके पूर्वज और पितर कष्ट में हैं, तो उसे कभी भी वास्तविक शांति नहीं मिल सकती। आइए जानते हैं उस स्वप्न और उस महान व्रत की पूरी कहानी जिसने एक राजा को मोक्ष के मार्ग पर ला खड़ा किया।
राजा इंद्रसेन के जीवन को झकझोर देने वाला वह रहस्यमयी और दिव्य सपना
महिष्मती के राजा इंद्रसेन प्रजापालक, धर्मपरायण और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनके राज्य में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं था। एक दिन जब वे अपने राजमहल के कक्ष में विश्राम कर रहे थे, तब उन्होंने रात के समय एक बहुत ही अजीब और भावुक करने वाला सपना देखा। उस स्वप्न में उन्होंने देखा कि उनके दिवंगत पिता यमराज की पुरी में भयंकर कष्ट भोग रहे हैं। उनके पिता ने भूखे और प्यासे तड़पते हुए राजा इंद्रसेन से यह गुहार लगाई कि वे नरक की यातनाओं से बहुत पीड़ित हैं और केवल उनके द्वारा किए जाने वाले एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान से ही उन्हें मुक्ति मिल सकती है। जब राजा की आंख खुली, तो उनका हृदय कांप उठा। उन्होंने तुरंत अपने राज्य के विद्वान ऋषियों और कुल गुरुओं को दरबार में आमंत्रित किया और अपने उस डरावने सपने का विस्तार से वर्णन किया।
देवर्षि नारद का आगमन और पितरों की मुक्ति का अचूक उपाय
राजा इंद्रसेन की इस गहरी चिंता और व्याकुलता को दूर करने के लिए स्वयं देवर्षि नारद (Devarshi Narada) उनके दरबार में पधारे। राजा ने हाथ जोड़कर नारद मुनि से अपने पिता के उद्धार का मार्ग पूछा। तब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि हे राजन, तुम्हारे पिता ने अपने पिछले जन्म में कोई ऐसा अधूरा कर्म या वचन छोड़ा था जिसके कारण उन्हें मृत्योपरांत यमलोक में कष्ट सहना पड़ रहा है। नारद मुनि ने राजा को समाधान बताते हुए कहा कि यदि वे आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को विधि-विधान के साथ उपवास रखें, तो उस व्रत के पुण्य प्रभाव से उनके पिता सीधे नरक से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्रस्थान कर जाएंगे। इस व्रत को ही 'इंदिरा एकादशी' (Indira Ekadashi) के नाम से जाना जाता है, जो पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए सबसे उत्तम मानी गई है।
इंदिरा एकादशी व्रत का कड़ा विधान और विधि-पूर्व पूजा का महत्व
देवर्षि नारद के बताए अनुसार राजा इंद्रसेन ने आश्विन मास की इंदिरा एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा और कठोर नियमों के साथ करने का संकल्प लिया। इस व्रत की शुरुआत दशमी तिथि के दिन से ही हो जाती है, जिसमें सूर्योदय से पहले स्नान करके एक समय ही सात्विक भोजन किया जाता है और दोपहर के बाद भोजन ग्रहण नहीं किया जाता। एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर राजा ने भगवान शालीग्राम या विष्णु जी की मूर्ति की स्थापना की, उन्हें पीले फूल, धूप, दीप, गंध और नैवेद्य अर्पित किए। उन्होंने पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करते हुए पूर्ण उपवास रखा और भगवान के नाम का स्मरण किया। इस व्रत में रात्रि जागरण का भी विशेष महत्व होता है, जिससे भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
पितरों के निमित्त तर्पण और ब्राह्मण भोजन से पूर्ण हुआ राजा का संकल्प
इंदिरा एकादशी के अगले यानी द्वादशी तिथि के दिन राजा इंद्रसेन ने सुबह सवेरे पुनः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा की और ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराया। इसके बाद उन्होंने अपने सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा दी और अपने पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक अन्न और जल का तर्पण किया। जैसे ही यह अनुष्ठान पूरा हुआ, आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी और महल में एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ। राजा ने जब ध्यान लगाया तो उन्होंने देखा कि उनके पिता दिव्य रूप धारण करके, विमान में बैठकर यमलोक से सीधे वैकुंठ की ओर जा रहे हैं और जाते हुए उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार राजा के उस एक सपने और सही व्रत के प्रभाव से न केवल उनके पिता का उद्धार हुआ, बल्कि राजा का जीवन भी धन्य हो गया।