अमावस्या का दुर्लभ संयोग, दुर्भाग्य और पितृ दोष दूर करने के लिए करें ये 5 अचूक उपाय
सनातन धर्म और हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष का समापन जिस पावन तिथि पर होता है, उसे सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के नाम से जाना जाता है, जो इस वर्ष बेहद खास और दुर्लभ संयोग के साथ आई है। इस बार सर्वपितृ अमावस्या के दिन ही 'शनिश्चरी अमावस्या' का दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है, जो ज्योतिषीय दृष्टिकोण से सदियों में कभी-कभार ही देखने को मिलता है। जब पितरों को समर्पित अमावस्या तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तो इसका धार्मिक और आध्यात्मिक प्रभाव कई गुना अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि इस दिन एक ही समय पर पितृ देव और न्याय के देवता शनि देव दोनों की विशेष कृपा प्राप्त की जा सकती है। देश भर के ज्योतिष आचार्यों और विद्वानों का यह मानना है कि पितृ पक्ष के इन सोलह दिनों में जो लोग अपने पितरों का विधिवत श्राद्ध या तर्पण नहीं कर पाए हैं, वे इस सर्वपितृ अमावस्या के महासंयोग पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान कर सकते हैं। इस दुर्लभ संयोग के कारण इस दिन किए जाने वाले दान-पुण्य, तर्पण और पूजा का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है, जिससे जीवन की तमाम बाधाएं और कष्ट अपने आप दूर होने लगते हैं।
पितृ दोष और शनि की साढ़ेसाती-ढैय्या से मुक्ति पाने के लिए पंचकर्म उपाय
जीवन में चल रही लगातार असफलताओं, आर्थिक तंगी, करियर में रुकावट और पारिवारिक कलह-कलेश के पीछे अक्सर ज्योतिष में पितृ दोष या शनि के नकारात्मक प्रभावों को मुख्य कारण माना गया है। शनिश्चरी अमावस्या के इस दुर्लभ योग पर यदि कुछ विशेष और अचूक उपाय पूरे विधि-विधान से कर लिए जाएं, तो बड़े से बड़ा दुर्भाग्य भी सौभाग्य में बदल सकता है। इन उपायों में सबसे पहला और महत्वपूर्ण कार्य पिण्ड दान, तर्पण और किसी पवित्र नदी के तट पर स्नान करने के बाद ब्राह्मण भोज या गरीबों को अन्न दान करना है। दूसरा उपाय यह है कि इस दिन पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर उसकी परिक्रमा करें और पितरों के साथ-साथ शनि देव का भी स्मरण करें, जिससे पितृ दोष और शनि की महादशा का प्रकोप शांत होता है। तीसरा अचूक उपाय काले कुत्ते, कौवे और गाय को पहली रोटी खिलाना है, क्योंकि इन्हें हमारे पूर्वजों और विभिन्न ग्रहों का प्रतीक माना गया है। इसके अलावा चौथा उपाय सूर्यास्त के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों के नाम से एक चौमुखी दीपक जलाना है, जिससे घर की नकारात्मक ऊर्जा हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। पांचवा और अंतिम उपाय तांबे के लोटे में जल, काला तिल और गंगाजल मिलाकर पीपल के पेड़ को अर्पित करना है, जिससे पितृ अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन दान-पुण्य और तर्पण का मिलता है अनंत फल
धर्मग्रंथों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या का दिन केवल शोक या विदाई का दिन नहीं होता है, बल्कि यह अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र तीर्थ स्थल, नदी या घर पर ही गंगाजल मिले जल से स्नान करने के बाद अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण करना चाहिए। पितरों के नाम से निकाला गया भोजन, वस्त्र और अन्न जब किसी जरूरतमंद, गरीब या ब्राह्मण को आदरपूर्वक दान किया जाता है, तो उसकी सीधी ऊर्जा हमारे पितृ लोक तक पहुंचती है। शनि और पितरों के इस दुर्लभ मिलन वाले दिन गरीबों की मदद करना, दिव्यांगों को भोजन कराना और काले कपड़ों या लोहे की वस्तुओं का दान करना शनि देव के प्रकोप को शांत करता है। जो जातक जीवन में बार-बार मिल रही असफलताओं से परेशान हो चुके हैं और जिन्हें लगता है कि उनके हर काम में अड़चनें आ रही हैं, वे इस विशेष अमावस्या पर सच्चे मन से अपने पूर्वजों का ध्यान करके इन उपायों को आजमाएं, तो उन्हें बहुत जल्द सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे। यह पावन दिन हमें हमारी संस्कृति, जड़ों और पूर्वजों के प्रति सम्मान सिखाने के साथ-साथ जीवन के अंधकार को दूर कर प्रकाश की ओर ले जाने का एक अद्भुत मार्ग प्रशस्त करता है।