Asha Dashami Vrat 2026: जब अर्जुन की निराशा देख श्रीकृष्ण ने सुझाया था यह चमत्कारी व्रत, जानें सही तिथि और महत्व
सनातन धर्म में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन 'आशा दशमी' का व्रत (Asha Dashami Vrat) रखा जाता है। यह व्रत जीवन में छाई हर तरह की निराशा, असफलता और अंधकार को दूर कर आशा की एक नई किरण जगाने वाला माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस व्रत को करता है, उसकी सभी अधूरी और मनोवांछित कामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। इस व्रत का संबंध महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है, जब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसके महत्व से अवगत कराया था। आइए जानते हैं साल 2026 में यह व्रत कब है, इसका शुभ मुहूर्त और इससे जुड़ी पौराणिक कथा।
साल 2026 में कब है आशा दशमी? जानिए शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार, साल 2026 में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई 2026 को दोपहर के समय हो रही है, जो अगले दिन यानी 25 जुलाई 2026 को दोपहर तक रहेगी। उदयातिथि की महत्ता को देखते हुए, आशा दशमी का मुख्य व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को रखा जाएगा।
इस दिन सुबह से ही पूजा का अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और माता आशा देवी के साथ-साथ भगवान शिव और विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए।
जब अर्जुन हो गए थे बेहद निराश: श्रीकृष्ण ने बताया था यह गुप्त मार्ग
आशा दशमी व्रत का महत्व महाभारत के एक प्रसंग से मिलता है। कथा के अनुसार, जब पांडव अज्ञातवास और वनवास का कठिन समय काट रहे थे, तब एक समय ऐसा आया जब अर्जुन अपनी परिस्थितियों को लेकर बेहद निराश और हताश हो गए थे। उन्हें आगे का कोई मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था और मन में संशय पैदा होने लगा था कि क्या वे कभी अपना राज्य वापस पा सकेंगे।
अपने प्रिय सखा अर्जुन को इस मानसिक अवसाद और निराशा में डूबा देख भगवान श्रीकृष्ण आगे आए। उन्होंने अर्जुन का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्हें ढांढस बंधाया और 'आशा दशमी व्रत' करने की सलाह दी। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यह व्रत जीवन की समस्त आशाओं को पुनर्जीवित करने वाला और दसों दिशाओं से सफलता दिलाने वाला है। अर्जुन ने भगवान के कहे अनुसार इस व्रत का पूरी विधि से पालन किया, जिसके प्रभाव से उनका खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौटा और अंततः पांडवों ने महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त की।
कैसे करें आशा दशमी की पूजा? नियम और विधि
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संकल्प और शुद्धि: व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें और पवित्र जल (गंगाजल) मिलाकर स्नान करें। साफ वस्त्र पहनकर दसों दिशाओं के दिग्पालों और माता आशा देवी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
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घट स्थापना और पूजन: पूजा स्थान पर एक चौकी स्थापित करें। इस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर माता दुर्गा या आशा देवी की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। साथ ही एक दीप प्रज्वलित करें।
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अर्पण: माता को धूप, दीप, गंध, पुष्प, फल और विशेष रूप से नैवेद्य (भोग) अर्पित करें। इस दिन आंगन में सुंदर रंगोली या चौक पूरने का भी विशेष महत्व होता है।
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कथा और आरती: पूजा के अंत में आशा दशमी व्रत की पौराणिक कथा का श्रवण या वाचन करें और कपूर से आरती उतारें।
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व्रत का पारण: यह व्रत लगातार कई वर्षों तक करने का विधान है। शाम को आरती के बाद फलाहार किया जा सकता है और अगले दिन सुबह ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है।