शारदीय नवरात्रि में सुबह और शाम की पूजा का है विशेष महत्व
सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और आस्था के महापर्व नवरात्रि तथा दुर्गा पूजा के इस पावन अवसर पर पूरे देश का माहौल भक्तिमय और ऊर्जावान बना हुआ है। हर तरफ देवी दुर्गा के नौ रूपों की उपासना, मंत्रोच्चार और शंखनाद की गूंज सुनाई दे रही है। ज्योतिषविदों, पंडितों और धर्मशास्त्रियों के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों में मां जगदंबा की विधि-विधान से की गई सेवा का साधक को बहुगुणा फल प्राप्त होता है। हालांकि, शास्त्रों में नवरात्रि की पूजा-अर्चना के लिए कुछ अत्यंत कड़े और महत्वपूर्ण नियम बताए गए हैं, जिनका पालन यदि सही तरीके से न किया जाए तो पूजा अधूरी मानी जाती है। विशेष रूप से सुबह की पूजा और संध्या काल (शाम की पूजा) के समय रखी जाने वाली सावधानियां घर में सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य लाती हैं। यदि आप भी इस नवरात्रि अपने घर में मां भगवती का आशीर्वाद बनाए रखना चाहते हैं, तो सुबह और शाम की आरती और पूजा के दौरान इन जरूरी बातों का ध्यान रखना न भूलें।
सुबह की नवरात्रि पूजा में इन जरूरी बातों का रखें खास ध्यान, ब्रह्म मुहूर्त में पूजन से जागती है सोई हुई किस्मत
शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि के दौरान सुबह की पूजा का सबसे उत्तम समय सूर्योदय से पूर्व यानी ब्रह्म मुहूर्त माना गया है। प्रातः काल स्नान ध्यान से निवृत्त होकर सबसे पहले स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर लाल या पीले रंग के) धारण करें, क्योंकि काला या नीला रंग नवरात्रि पूजन में पूरी तरह वर्जित माना गया है। सुबह की पूजा में सबसे पहले कलश देवता, अखंड ज्योति और मां दुर्गा को ताजे जल तथा गंगाजल से आचमन कराएं। इसके पश्चात उन्हें रोली, अक्षत, सिंदूर, लाल चुनरी और लाल कनेर या गुड़हल के फूल अर्पित करें। सुबह के समय मां को ताजे फलों, मखाने की खीर या हलवे का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। ध्यान रखें कि सुबह की पूजा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही बैठना चाहिए, क्योंकि यह दिशा सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाती है। इसके अलावा, दुर्गा सप्तशती का पाठ या सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ हमेशा शुद्ध उच्चारण के साथ करना चाहिए और पाठ के बीच में किसी से बातचीत करने या उठने की मनाही होती है।
संध्या काल की पूजा और आरती के समय भूलकर भी न करें ये गलतियां, अखंड ज्योति की सुरक्षा है सबसे अहम
अक्सर लोग सुबह की पूजा पर तो पूरा ध्यान देते हैं, लेकिन शाम की पूजा यानी संध्या आरती के समय कुछ अनजाने में गलतियां कर बैठते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार, सूर्यास्त के समय यानी गोधूलि बेला में शाम की पूजा का विधान है। शाम को पूजा शुरू करने से पहले घर के मुख्य द्वार पर दीपक अवश्य जलाएं और मंदिर में झाड़ू-पोंछा या सफाई न करें, केवल जल का छिड़काव करके वातावरण को पवित्र करें। संध्या काल की आरती हमेशा दो बाती वाले शुद्ध देशी गाय के घी के दीपक या तिल के तेल के दीपक से ही करनी चाहिए। आरती के दौरान घंटी, शंख और मंजीरे की ध्वनि घर की नकारात्मक ऊर्जा को पूरी तरह समाप्त कर देती है। यदि आपके घर में नवरात्रि की अखंड ज्योति जल रही है, तो शाम के समय उसमें घी या तेल की मात्रा दोबारा जांच लें और यह सुनिश्चित करें कि हवा के झोंके से ज्योति न बुझे। शाम की पूजा के बाद मां को सूखे मेवे या बताशे का भोग लगाएं और आरती समाप्त होने के बाद पूरे घर में आरती की धूनी जरूर घुमाएं।
माता रानी का आशीर्वाद पाने के लिए सात्विक दिनचर्या और आचरण का पालन करना है बेहद जरूरी
केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि नवरात्रि के दौरान व्यक्ति का आचरण और खान-पान भी पूजा के परिणामों को निर्धारित करता है। इन नौ दिनों में घर में पूरी तरह से सात्विक वातावरण होना चाहिए। लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा या किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। इसके अलावा, दाढ़ी-मूंछ बनवाना, बाल कटवाना या नाखून काटना भी नवरात्रि के दौरान शुभ नहीं माना जाता। जो लोग व्रत रख रहे हैं, उन्हें दिन के समय सोने से बचना चाहिए और अपना मन मां दुर्गा के ध्यान, मंत्र जाप (जैसे 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे') में लगाना चाहिए। घर में किसी भी प्रकार का कलह, क्रोध या बुजुर्गों का अनादर करने से बचें, क्योंकि मां दुर्गा केवल वहीं वास करती हैं जहां शांति, स्वच्छता और सम्मान का वातावरण होता है। इन सरल लेकिन अत्यंत फलदायी नियमों का पालन करके आप इस नवरात्रि मां भगवती की असीम अनुकंपा प्राप्त कर सकते हैं।