अब धाम लौटेंगे महाप्रभु: स्वर्ण आभूषणों से लदकर जगन्नाथ देंगे भव्य दर्शन, फिर होगी 'अधर पाना' की खास रस्म
ओडिशा के पुरी (Puri) में स्थित विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा अपने अंतिम और सबसे आकर्षक पड़ाव पर पहुंच चुकी है। गुंडिचा मंदिर में नौ दिनों तक रहने के बाद, महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने मुख्य धाम (श्री मंदिर) लौट आए हैं, जिसे 'बहुड़ा यात्रा' कहा जाता है। सिंहद्वार के सामने खड़े रथों पर अब भगवान की सबसे भव्य और अलौकिक रस्में शुरू होने जा रही हैं। आज महाप्रभु अपने तीनों रथों पर 'सुना बेष' (Suna Besha) यानी स्वर्ण रूप में लाखों श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे, जिसके ठीक बाद 'अधर पाना' की एक बेहद पवित्र और रहस्यमयी रस्म का आयोजन किया जाएगा।
स्वर्ण आभूषणों से सजेगा भगवान का दरबार, दिखेगा 'सुना बेष' का वैभव
रथयात्रा उत्सव के दौरान 'सुना बेष' का दर्शन सबसे पावन और दुर्लभ माना जाता है। इस खास दिन पर महाप्रभु जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र को सोने के विशाल और अत्यंत प्राचीन आभूषणों से सजाया जाता है। श्री मंदिर के रत्न भंडार से भारी सुरक्षा के बीच कुंडल, मुकुट, करधनी, और भगवान के सोने के हाथ-पैर (श्री हस्त और श्री पयार) लाकर रथों पर विराजमान विग्रहों को पहनाए जाते हैं। सोने से लदे महाप्रभु का यह अलौकिक रूप देखने के लिए पुरी में लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा है। मान्यता है कि इस रूप के दर्शन मात्र से ही इंसान के सभी पाप धुल जाते हैं।
क्या है 'अधर पाना' की रस्म? रथों पर अर्पित होगा दिव्य पेय
सुना बेष के भव्य दर्शनों के अगले दिन 'अधर पाना' (Adhara Pana) की सदियों पुरानी रस्म निभाई जाती है। 'अधर' का अर्थ होता है होंठ और 'पाना' का अर्थ है मीठा पेय। इस रस्म के तहत दूध, चीनी, पनीर, केला, इलायची और विभिन्न मसालों से एक विशेष सुगंधित पेय तैयार किया जाता है। इस दिव्य पेय को मिट्टी के नौ बड़े-बड़े बर्तनों (घड़ों) में भरकर तीनों रथों पर रखा जाता है। यह घड़े इतने ऊंचे होते हैं कि इनका ऊपरी हिस्सा सीधे तौर पर भगवान के अधरों यानी होंठों तक पहुंचता है, इसीलिए इसे अधर पाना कहा जाता है।
क्यों तोड़ दिए जाते हैं मिट्टी के घड़े? पार्श्व देवताओं को मिलता है मोक्ष
अधर पाना की रस्म का सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी हिस्सा इसके तुरंत बाद शुरू होता है। भगवान को यह पेय अर्पित करने के बाद, पुजारियों द्वारा जानबूझकर इन सभी मिट्टी के घड़ों को रथों पर ही तोड़ दिया जाता है। घड़े टूटते ही सारा मीठा पेय रथ के चारों ओर बहने लगता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, रथयात्रा के दौरान कई अदृश्य आत्माएं, चंडी-चामुंडा और रथ के रक्षक 'पार्श्व देवता' महाप्रभु की सेवा में उपस्थित रहते हैं। रथ पर बिखरे इस प्रसाद को ग्रहण करके इन भूखे-प्यासे जीवों और पार्श्व देवताओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है। आम जनता को इस प्रसाद को छूने या ग्रहण करने की मनाही होती है।
'नीलाद्रि बीजे' के साथ गर्भगृह में प्रवेश करेंगे महाप्रभु, थमेगा उत्सव
अधर पाना की इस पावन रस्म के संपन्न होने के बाद, अगले दिन 'नीलाद्रि बीजे' (Niladri Bije) की रस्म होगी। इस रस्म के साथ ही महाप्रभु जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ रथों को छोड़कर वापस श्री मंदिर के मुख्य गर्भगृह और रत्न सिंहासन पर विराजमान हो जाएंगे। मंदिर के अंदर प्रवेश करते समय भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के बीच मान-मनौव्वल और रसगुल्ला खिलाने की एक बेहद खूबसूरत रस्म भी निभाई जाएगी। इसके साथ ही इस वर्ष की महाप्रभु की भव्य रथयात्रा का आधिकारिक रूप से समापन हो जाएगा और मंदिर के कपाट आम दर्शनों के लिए नियमित रूप से खुल जाएंगे।