पापांकुशा एकादशी 2026: कब है व्रत? जानें शुभ मुहूर्त

पापांकुशा एकादशी 2026: कब है व्रत? जानें शुभ मुहूर्त

सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ और सर्वपापहारी माना गया है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को 'पापांकुशा एकादशी' (Papankusha Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है— 'पाप' और 'अंकुश' यानी यह एकादशी मनुष्य के समस्त जन्मों के पापों पर अंकुश लगाकर उन्हें नष्ट कर देती है और प्राणी को अक्षय पुण्य की प्राप्ति कराती है। हिंदू धर्मग्रंथों और पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति निष्काम या सकाम भाव से पापांकुशा एकादशी का व्रत रखता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ सूर्यग्रहण के समय दान करने से मिलने वाले पुण्य के बराबर फल प्राप्त होता है। साल 2026 में आश्विन मास की इस पावन एकादशी की सही तिथि, पूजा के शुभ मुहूर्त और पारण समय को लेकर श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्सुकता देखी जा रही है। आइए जानते हैं पापांकुशा एकादशी 2026 की सटीक तिथि, धार्मिक महत्व और इसके पीछे की संपूर्ण महिमा के बारे में।

पापांकुशा एकादशी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी

वर्ष 2026 में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ और समापन शास्त्रों के अनुसार विशेष योगों में हो रहा है। पंचांग की गणना के अनुसार आश्विन शुक्ल एकादशी तिथि की शुरुआत 20 अक्टूबर 2026 को संध्या काल में होगी और इसका समापन 21 अक्टूबर 2026 को होगा। उदयातिथि के नियम और वैष्णव परंपरा के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का व्रत 21 अक्टूबर 2026, बुधवार को ही रखा जाएगा। व्रत का पारण (व्रत खोलना) अगले दिन यानी 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार को सूर्योदय के पश्चात द्वादशी तिथि के भीतर किया जाएगा। एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा-अर्चना का विशेष विधान है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके व्रत का संकल्प लेना और पूरे दिन फलाहार या निर्जल रहकर प्रभु भक्ति में लीन रहना परम कल्याणकारी माना गया है।

1000 अश्वमेध यज्ञ और 100 सूर्यग्रहण दान के बराबर क्यों माना जाता है इसका फल?

महाभारत काल में जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आश्विन शुक्ल एकादशी के महत्व के बारे में पूछा, तब लीलाधर श्रीहरि ने उन्हें पापांकुशा एकादशी की कथा और महिमा सुनाई थी। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया था कि जो भी मनुष्य अपने जीवन में जाने-अनजाने किए गए पापों से मुक्ति पाना चाहता है, उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ रूप का पूजन करने से साधक के पूर्व जन्मों के बड़े से बड़े पाप भी क्षण भर में भस्म हो जाते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि जो फल कठिन तपस्या, तीर्थ यात्राओं और एक हजार अश्वमेध यज्ञ करने से प्राप्त नहीं होता, वह केवल पापांकुशा एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करने से ही सुलभ हो जाता है। यही कारण है कि इसे मोक्षदायिनी और भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाली एकादशी कहा गया है।

पापांकुशा एकादशी की सरल पूजा विधि और नियम

पापांकुशा एकादशी के दिन स्नान-ध्यान के पश्चात घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें और भगवान विष्णु का गंगाजल तथा दूध से अभिषेक करें। प्रभु को पीले फूल, तुलसी दल, पीले वस्त्र, फल और पंचामृत अर्पित करें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि तुलसी पत्र एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी के दिन तुलसी दल तोड़ना वर्जित माना जाता है। पूजा के दौरान "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का निरंतर जाप करते रहें और पापांकुशा एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें। संध्या के समय आरती करके केवल सात्विक फलाहार ही ग्रहण करें। एकादशी के दिन चावल का सेवन पूरी तरह से वर्जित होता है, इसलिए व्रत न रखने वाले परिवार के अन्य सदस्यों को भी इस दिन चावल खाने से परहेज करना चाहिए।

दान और एकादशी पारण का विशेष महत्व

एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण नियमानुसार और शुभ मुहूर्त में किया जाए। द्वादशी तिथि के दिन सुबह स्नान करके पुनः भगवान विष्णु की पूजा करें, किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र, तिल, जल से भरा कलश और दक्षिणा दान करें। इसके पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करके व्रत का पारण करें। जो श्रद्धालु पापांकुशा एकादशी के दिन स्वर्ण, तिल, भूमि, गौ या अन्न का दान करते हैं, उन्हें यमलोक के कष्ट नहीं भोगने पड़ते और वे अंत समय में बैकुंठ धाम को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार पापांकुशा एकादशी का यह पावन व्रत हर मनुष्य के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और पापमुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।