प्रभु श्रीराम और उनके भाइयों का बचपन, राजदरबार में महर्षि विश्वामित्र का आगमन
अश्विन मास के पावन नवरात्र और विजयादशमी के उल्लास के बीच देश भर में रामलीलाओं का मंचन पूरी भव्यता और उत्साह के साथ जारी है। रामलीला के दूसरे दिन की कथा भगवान श्रीराम और उनके तीनों भाइयों—लक्ष्मण, भारत और शत्रुघ्न—के अत्यंत मनमोहक और अलौकिक बाल्यकाल से आगे बढ़ती है। अयोध्या नगरी के राजा दशरथ के महलों में चारों राजकुमारों की किलकारियों और उनकी बाल-लीलाओं से पूरा वातावरण संगीत में और आनंदमय बना रहता है। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते हुए चारों भाइयों का प्रेम, अनुशासन और विनय पूरी अयोध्या के लिए गर्व का विषय बना हुआ है। लेकिन रामलीला के दूसरे दिन का सबसे बड़ा और रोमांचक मोड़ तब आता है जब अयोध्या के भव्य राजदरबार में अचानक महर्षि विश्वामित्र का आगमन होता है, जिनके चेहरे पर एक तरफ तेज और दूसरी तरफ आसुरी शक्तियों के विनाश की गंभीर चिंता साफ झलक रही होती है।
अयोध्या के महलों में गूंजती बाल-लीलाओं की मधुर स्वरलहरियां, राजा दशरथ का वात्सल्य और भाइयों का अटूट प्रेम
रामलीला के मंच पर जब बाल श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के बचपन के दृश्यों का सजीव मंचन किया जाता है, तो दर्शक भावविभोर हो जाते हैं। माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी के आंचल में पलने वाले ये चारों राजकुमार अपनी नटखट और प्रिय हरकतों से पूरे राजमहल को महकाए रखते हैं। कभी भाइयों के बीच खिलौनों को लेकर प्रेम भरा झगड़ा तो कभी गुरुओं की आज्ञा का पालन करने में उनकी तत्परता, दर्शकों को भगवान श्रीराम के आदर्श स्वरूप के शुरुआती दिनों की याद दिलाती है। चारों भाइयों के बीच का यह अनूठा और अटूट प्रेम इस बात का प्रतीक है कि कैसे आदर्श पारिवारिक संस्कार जीवन की नींव मजबूत करते हैं। अयोध्या की प्रजा अपने इन राजकुमारों की एक झलक पाने के लिए हमेशा उत्सुक रहती है और उनके भविष्य को लेकर मंगल कामनाएं करती है।
राजदरबार में महर्षि विश्वामित्र का रहस्यमयी और ओजस्वी आगमन, राजा दशरथ द्वारा भव्य स्वागत
बाल-लीलाओं के आनंद के बीच अचानक मंच पर महर्षि विश्वामित्र के प्रवेश का दृश्य आते ही रामलीला का माहौल पूरी तरह गंभीर और आध्यात्मिक हो जाता है। लंबे जटा-जूट, शरीर पर तपस्वी वस्त्र और हाथों में कमंडल लिए महर्षि विश्वामित्र जब महाराज दशरथ के दरबार में पग रखते हैं, तो राजा दशरथ समेत सभी दरबारी उनके तेज को देखकर अपने आसनों से खड़े हो जाते हैं और साष्टांग प्रणाम करते हैं। राजा दशरथ अत्यंत आदर और विनम्रता के साथ महर्षि का स्वागत करते हुए उनके आगमन का कारण पूछते हैं। महाराज दशरथ अपने आराध्य गुरुओं और ऋषियों की सेवा में कभी पीछे नहीं हटते, और महर्षि के पधारने पर वे खुद को बेहद भाग्यशाली महसूस करते हैं, उन्हें यह आभास नहीं होता कि आने वाले कुछ पलों में उनकी परीक्षा की घड़ी शुरू होने वाली है।
ताड़का और मारीच के आतंक से मुक्ति के लिए राम-लक्ष्मण की मांग, धर्म और कर्तव्य की बड़ी परीक्षा
दरबार में पधारने के बाद महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के सामने अपना वास्तविक उद्देश्य रखते हैं और बताते हैं कि वे अपने यज्ञ को पूर्ण करने के लिए वन में राक्षसों के आतंक से त्रस्त हैं। महर्षि ताड़का, मारीच और सुबाहु जैसे शक्तिशाली असुरों के यज्ञ में खलल डालने की बात कहते हैं और उनके संहार के लिए भगवान श्रीराम को अपने साथ भेजने का अनुरोध करते हैं। अपने अतिप्रिय और बालस्वरूप श्रीराम को अचानक जंगलों की कठिन परिस्थितियों और राक्षसों के बीच भेजने की बात सुनकर राजा दशरथ का पिता हृदय कांप उठता है। वे महर्षि से अनुरोध करते हैं कि श्रीराम अभी बहुत छोटे और कोमल हैं, उनकी जगह वे खुद अपनी पूरी सेना के साथ जाकर राक्षसों का वध कर सकते हैं। लेकिन महर्षि विश्वामित्र के अडिग संकल्प और धर्म की रक्षा के इस आह्वान के बीच गुरु वशिष्ठ राजा दशरथ को समझाते हैं कि राम का यह अवतार ही अधर्म के नाश के लिए हुआ है, जिसके बाद भारी मन से ही सही लेकिन राजा दशरथ अपने दोनों पुत्रों श्रीराम और लक्ष्मण को महर्षि के साथ भेजने का ऐतिहासिक निर्णय लेते हैं।