पुरी रथ यात्रा: चौथे दिन क्यों तोड़ दिया जाता है रथ का पहिया? मां लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ की 'अनोखी नोक-झोंक' की पूरी कहानी
विश्व प्रसिद्ध पुरी रथ यात्रा के दौरान कई ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं, जो न केवल अद्भुत हैं बल्कि मानवीय रिश्तों की गहराई को भी दर्शाती हैं। रथ यात्रा के चौथे या पांचवें दिन एक ऐसी रस्म होती है जिसे देखकर भक्त आश्चर्यचकित रह जाते हैं—भगवान जगन्नाथ के मुख्य रथ 'नंदीघोष' का एक हिस्सा या पहिया तोड़ दिया जाता है। इस रस्म के पीछे कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ और उनकी पत्नी मां लक्ष्मी के बीच का गहरा प्रेम, विरह और वह मीठी नोक-झोंक है, जिसे सदियों से 'हेरा पंचमी' के रूप में मनाया जाता है।
हेरा पंचमी: जब विरह में क्रोधित हो उठीं माता लक्ष्मी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर 9 दिनों के लिए अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर जाते हैं, तो वे अपनी पत्नी मां लक्ष्मी को श्रीमंदिर में ही छोड़ जाते हैं। भगवान जगन्नाथ उन्हें वादा करते हैं कि वे जल्द वापस आएंगे। लेकिन जब रथ यात्रा शुरू होने के बाद चार दिन बीत जाते हैं और पांचवें दिन तक भगवान नहीं लौटते, तो मां लक्ष्मी व्याकुल हो जाती हैं। ओड़िया भाषा में 'हेरा' का अर्थ होता है 'देखना' या 'ढूंढना', इसलिए इस दिन को 'हेरा पंचमी' कहा जाता है।
रथ का पहिया तोड़ना: देवी का 'न्यायसंगत क्रोध'
गुस्से और विरह से भरी मां लक्ष्मी पालकी में सवार होकर अपने सेवकों के साथ गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। यहां एक और दिलचस्प मोड़ आता है—जब देवी मंदिर के सिंहद्वार पर पहुंचती हैं, तो भगवान जगन्नाथ के सेवक उनके अपमान के लिए मंदिर के दरवाजे बंद कर देते हैं। अपने इस अपमान और पति के न मिलने से मां लक्ष्मी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। अपने क्रोध को प्रकट करने के लिए देवी के आदेश पर सेवक भगवान जगन्नाथ के मुख्य रथ 'नंदीघोष' का एक हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से तोड़ देते हैं। इसे मंदिर की परंपरा में 'रथ भंगा नीति' कहा जाता है।
रसगुल्ले से होती है रूठी हुई लक्ष्मी की मान-मनौव्वल
रथ को नुकसान पहुंचाने के बाद मां लक्ष्मी को लोक-लाज का अहसास होता है और वे 'हेरा गोहिरी साही' नाम की एक तंग गली से छिपते-छिपाते मुख्य मंदिर लौट आती हैं। जब 9 दिन बाद भगवान जगन्नाथ अपनी 'बाहुदा यात्रा' (वापसी यात्रा) पूरी करके मंदिर पहुंचते हैं, तो वहां भी उनका स्वागत आसान नहीं होता। जब वे मंदिर के 'जय-विजय द्वार' पर पहुंचते हैं, तो मां लक्ष्मी के आदेश पर दरवाजे फिर बंद कर दिए जाते हैं। अंत में, भगवान जगन्नाथ अपनी रूठी हुई पत्नी को मनाने के लिए उन्हें उनकी सबसे प्रिय मिठाई 'रसगुल्ला' भेंट करते हैं। इस मिठास को देखकर देवी का गुस्सा शांत होता है और वे कपाट खोलकर भगवान का भव्य स्वागत करती हैं।