सौरभ के परिवार ने अपनाने से किया इनकार, नानी-नानी के भी खड़े हुए हाथ
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले को झकझोर कर रख देने वाले बहुचर्चित 'नीले ड्रम हत्याकांड' (Blue Drum Murder Case) में अदालत द्वारा मुख्य आरोपी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद अब इस खौफनाक वारदात के सबसे संवेदनशील और मानवीय पहलू पर चर्चा तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक मासूम बच्ची के भविष्य को अंधेरे में धकेल दिया है। एक तरफ जहां मां जेल की सलाखों के पीछे मौत के साए में जी रही है और पिता इस दुनिया में नहीं हैं, वहीं अब उस छोटी सी बच्ची की परवरिश और उसके भविष्य को लेकर परिवार के लोगों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। इस स्थिति ने समाज के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इस बेकसूर बच्ची की देखभाल अब कौन करेगा और उसका आने वाला कल कैसा होगा।
क्या है पूरा मामला और क्यों पैदा हुआ यह संकट?
गौरतलब है कि कुछ समय पहले मेरठ में मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत की बेहद बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस जघन्य हत्याकांड में अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद मृतक की पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी की सजा सुनाई। इस बीच सबसे बड़ा असमंजस यह है कि जेल में बंद रहने के दौरान मुस्कान ने एक दूसरी बच्ची को भी जन्म दिया था। इस छोटी बेटी के पैतृक अधिकार और भविष्य को लेकर जब सौरभ राजपूत के परिवार से बात की गई, तो उन्होंने दो टूक शब्दों में इस बच्ची को अपनाने से साफ इनकार कर दिया। सौरभ के परिजनों का कहना है कि जिस दर्दनाक तरीके से उनके बेटे की हत्या की गई और उसके बाद जो खुलासे हुए, उसके बाद उनके लिए इस बच्ची को अपने परिवार का हिस्सा बनाना नैतिक और पारिवारिक रूप से संभव नहीं है।
नानी और अन्य रिश्तेदारों की असमर्थता ने बढ़ाई मुश्किलें
केवल सौरभ का परिवार ही नहीं, बल्कि खुद मुस्कान की तरफ से भी इस छोटी बच्ची के पालन-पोषण को लेकर मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। मुस्कान की बड़ी बेटी जहां उसके माता-पिता (नाना-नानी) के पास रह रही है, वहीं जेल में जन्मी इस छोटी बच्ची को संभालने को लेकर परिवार के अन्य सदस्यों और नानी ने भी अपनी पारिवारिक व आर्थिक विवशताओं का हवाला देते हुए हाथ खड़े कर दिए हैं। बुजुर्ग हो चुके नाना-नानी पहले ही बड़ी नातिन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और इस बड़ी त्रासदी के बाद उनका मानसिक और आर्थिक ढांचा पूरी तरह हिल चुका है। ऐसे में इसोध और असहाय नवजात या छोटी बच्ची की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई भी आगे आने को तैयार नहीं दिख रहा है, जिससे उसका भविष्य पूरी तरह अधर में लटक गया है।
कानून और समाज के सामने एक गंभीर सवाल
एक तरफ जहां न्यायपालिका ने हत्यारों को उनके गुनाह की कड़ी सजा दे दी है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह के जघन्य अपराधों के बीच पिस जाने वाले मासूम बच्चों का भविष्य न्याय व्यवस्था और समाज के लिए एक बड़ा विचारणीय विषय बन गया है। बाल कल्याण समितियों (Child Welfare Committees) और प्रशासनिक एजेंसियों की नजर अब इस मामले पर टिकी हुई है ताकि यह तय किया जा सके कि बच्ची को किसी सुरक्षित सरकारी संरक्षण गृह या वैध संस्थान में बेहतर परवरिश मिल सके। माता-पिता के कुकर्मों की सजा उस मासूम को भुगतनी पड़ रही है जिसका इस दुनिया में अभी ठीक से वजूद भी शुरू नहीं हुआ था।
भविष्य की अनिश्चितता और मानवीय संवेदनाएं
इस दुखद प्रकरण ने एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अपराध की दुनिया का अंत तो हो जाता है, लेकिन उसके पीछे छूट जाने वाले बेकसूर बच्चों की जिंदगी हमेशा के लिए बिखर जाती है। समाजसेवियों और बाल अधिकारों के जानकारों का मानना है कि इस बच्ची के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए प्रशासनिक स्तर पर तुरंत कदम उठाए जाने चाहिए ताकि उसे एक सामान्य और सुरक्षित जीवन मिल सके।