धम्म दीक्षा और 22 प्रतिज्ञाओं के घेरे में फंसे सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी
भारतीय राजनीति में धर्म, आस्था और वैचारिक बहसों का दौर हमेशा से ही काफी संवेदनशील और तीखा रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और जाने-माने नेता राजकुमार भाटी से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। विजयादशमी के पावन अवसर पर दिल्ली के रानी झांसी रोड स्थित अंबेडकर भवन में आयोजित एक 'विशाल धम्म दीक्षा समारोह' में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए राजकुमार भाटी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। इस वीडियो में वे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा दी गई बौद्ध धर्म की प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाओं को दोहराते हुए नजर आ रहे हैं। इन प्रतिज्ञाओं में हिंदू देवी-देवताओं जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम और श्रीकृष्ण को भगवान न मानने और उनकी पूजा न करने के संकल्प शामिल हैं। जैसे ही यह वीडियो इंटरनेट पर प्रसारित हुआ, विपक्षी दलों ने विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व पर तीखे हमले शुरू कर दिए। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के नेताओं का ऐसे धार्मिक और वैचारिक आयोजनों में शामिल होना उनकी पार्टी की वैचारिक लाइन का हिस्सा है या फिर यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। आइए विस्तार से जानते हैं कि धम्म दीक्षा क्या है, 22 प्रतिज्ञाओं का इतिहास क्या है और इस पूरे विवाद पर राजकुमार भाटी ने अपनी सफाई में क्या कहा है।
क्या है धम्म दीक्षा और बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा बनाई गई उन 22 प्रतिज्ञाओं का पूरा इतिहास
इस पूरे विवाद के केंद्र में मौजूद 'धम्म दीक्षा' और '22 प्रतिज्ञाओं' के ऐतिहासिक महत्व को समझना बेहद जरूरी है। भारतीय इतिहास में 14 अक्टूबर 1956 का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज है, जब संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने नागपुर के दीक्षाभूमि पर अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था। उस ऐतिहासिक अवसर पर बाबा साहेब ने समाज में फैली छुआछूत, जातिगत भेदभाव, असमानता और पाखंड का विरोध करने तथा बौद्ध धम्म के मार्ग पर चलने के लिए अपने अनुयायियों को कुल 22 विशेष प्रतिज्ञाएं दिलाई थीं। इन 22 प्रतिज्ञाओं में यह मुख्य रूप से शामिल है कि जो व्यक्ति बौद्ध धर्म अपनाएगा, वह हिंदू धर्म के देवी-देवताओं जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम और कृष्ण को भगवान के रूप में नहीं मानेगा और न ही उनकी पूजा करेगा। इसके अलावा, पारंपरिक हिंदू संस्कारों, कर्मकांडों और ब्राह्मणों के माध्यम से कराए जाने वाले धार्मिक कृत्यों का त्याग करने की बात भी इन प्रतिज्ञाओं का अहम हिस्सा रही है। समय-समय पर देश भर में दलित और बौद्ध संगठनों द्वारा ऐसे धम्म दीक्षा समारोह आयोजित किए जाते हैं, जिनमें लोग इन प्रतिज्ञाओं को दोहराते हैं।
समारोह में शामिल होने पर क्यों मचा सियासी घमासान, बीजेपी और विपक्षी दलों ने सपा को घेरा
जैसे ही समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी का इन 22 प्रतिज्ञाओं को पढ़ते हुए वीडियो सामने आया, राजनीतिक दलों, विशेष रूप से बीजेपी ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया। बीजेपी नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाया कि एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेता चुनाव के समय मंदिरों के चक्कर काटते हैं और खुद को सनातन आस्था का पैरोकार बताते हैं, वहीं उनकी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता मंच से हिंदू देवी-देवताओं को न मानने की शपथ ले रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह समाजवादी पार्टी का 'दोहरा चरित्र' है जो चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर अलग-अलग नीतियां अपनाता है। विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि क्या हिंदू देवी-देवताओं और आस्था के केंद्रों के खिलाफ इस प्रकार की प्रतिज्ञाएं लेना किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के अधिकृत प्रतिनिधि को शोभा देता है। इस तीखे विरोध के चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से 'सॉफ्ट हिंदुत्व' बनाम 'दलित-पिछड़ा वैचारिकी' की बहसें तेज हो गई हैं, और आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इसे एक बड़ा सियासी हथियार माना जा रहा है।
राजकुमार भाटी की तीखी प्रतिक्रिया और खंडन: "मैंने नहीं छोड़ा हिंदू धर्म, यह बीजेपी आईटी सेल का दुष्प्रचार है"
अपने ऊपर चौतरफा हमले और बढ़ते राजनीतिक दबाव को देखते हुए सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने खुद सामने आकर इस पूरे मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ी और तमाम दावों को सिरे से खारिज कर दिया। राजकुमार भाटी ने एक वीडियो जारी कर और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से स्पष्ट किया कि उन्होंने न तो हिंदू धर्म छोड़ा है और न ही उनका धर्म परिवर्तन करने का कोई इरादा है। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि वे 20 अक्टूबर को दिल्ली के अंबेडकर भवन में भारतीय बौद्ध महासभा द्वारा आयोजित 'विशाल धम्म दीक्षा समारोह' में केवल एक मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। एक जिम्मेदार राजनीतिक कार्यकर्ता और समाजवादी होने के नाते वे हर धर्म, जाति और समुदाय के लोगों का सम्मान करते हैं। भाटी ने अपनी सफाई में तर्क दिया, "मैं सिख भाइयों के बुलावे पर गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाता हूं, मुस्लिम भाइयों के आयोजनों में शामिल होता हूं और हिंदू धर्म के तीज-त्योहारों व कार्यक्रमों में भी पूरी श्रद्धा से भाग लेता हूं। बौद्ध धर्म और महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं के प्रति मेरा अगाध स्नेह है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मैंने अपना धर्म बदल लिया है। यह सब विपक्षी दलों और विशेषकर बीजेपी आईटी सेल द्वारा फैलाया गया एक दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार है। हम किसी भी धर्म में रहकर समाज की कुप्रथाओं, छुआछूत और पाखंड के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। जनता को इस तरह की भ्रमित करने वाली खबरों में नहीं आना चाहिए। बहरहाल, भाटी के इस स्पष्टीकरण के बाद भले ही उन्होंने धर्म परिवर्तन की बात से इनकार कर दिया हो, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने चुनावी मौसम में राजनीतिक सरगर्मी को और अधिक बढ़ा दिया है।"