1915 में हरिद्वार आए बापू...गांधी जी के जीवन का वो टर्निंग पॉइंट, जिसने उन्हें बनाया महात्मा

1915 में हरिद्वार आए बापू...गांधी जी के जीवन का वो टर्निंग पॉइंट, जिसने उन्हें बनाया महात्मा

भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विश्व इतिहास के पन्नों में साल 1915 का एक ऐसा अध्याय दर्ज है जिसने न केवल एक साधारण इंसान की सोच को बदला, बल्कि पूरे देश के भविष्य की दिशा तय कर दी। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ अपने सफल सत्याग्रह के बाद जब मोहनदास कर्मचंद गांधी 1915 में भारत वापस लौटे, तो वे भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक नब्ज को महसूस करना चाहते थे। इसी खोज में वे अप्रैल 1915 के कुंभ मेले के दौरान पवित्र नगरी हरिद्वार पहुंचे। देवभूमि हरिद्वार की पावन धरती पर बिताए गए उन कुछ दिनों ने बापू के जीवन में एक ऐसा क्रांतिकारी परिवर्तन यानी टर्निंग पॉइंट ला दिया, जिसने उन्हें 'मोहनदास' से दुनिया के महानतम नेता 'महात्मा गांधी' बनने की राह पर अग्रसर कर दिया। आइए जानते हैं 1915 में हरिद्वार यात्रा के दौरान ऐसा क्या घटा जिसने गांधी जी के विचारों, जीवनशैली और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के पूरे ताने-बाने को बदलकर रख दिया।

1915 का हरिद्वार आगमन और कुंभ मेले में मोहनदास का पहला कदम

साल 1915 में जब बापू दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, तो उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें पूरे देश का दौरा करने और भारत की वास्तविक स्थिति को अपनी आंखों से देखने की सलाह दी थी। इसी सिलसिले में अप्रैल 1915 में महाकुंभ के पावन अवसर पर गांधी जी हरिद्वार पहुंचे। हरिद्वार की पावन भूमि पर पग रखते ही उनका सामना भारत की अपार जनआस्था, धार्मिक परंपराओं और पवित्र गंगा के पावन तट से हुआ। वे गुरुकुल कांगड़ी पहुंचे जहां स्वामी श्रद्धानंद जी और वहां के आचार्यों ने उनका भव्य स्वागत किया। हरिद्वार के शांत वातावरण, गंगा की धारा और गुरुकुल के गुरुकुल परंपरा वाले माहौल ने गांधी जी के हृदय पर बहुत गहरा असर डाला और उन्होंने भारत के आध्यात्मिक वैभव को बेहद करीब से महसूस किया।

कुंभ मेले में देखा आडंबर और स्वच्छता की कमी, वहीं से लिया सादगी और सेवा का संकल्प

हरिद्वार यात्रा केवल आध्यात्मिक शांति का अनुभव करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस यात्रा ने गांधी जी को भारतीय समाज की गहरी कुरीतियों से भी रूबरू कराया। कुंभ मेले के दौरान हरिद्वार की गलियों और गंगा घाटों पर फैली गंदगी, पंडा-पुजारियों के कर्मकांडीय आडंबरों और साधु-संतों के वेश में छिपे ढोंग को देखकर बापू का मन बेहद द्रवित हो उठा। उन्होंने महसूस किया कि बिना स्वच्छता और नैतिक शुद्धि के कोई भी समाज या देश आजाद नहीं हो सकता। इसी हरिद्वार यात्रा के दौरान गांधी जी ने अपनी जीवनशैली में आमूलचूल बदलाव करने का कठोर संकल्प लिया। उन्होंने फैसला किया कि वे अपना जीवन पूरी सादगी, संयम और न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जिएंगे, और वहीं से उन्होंने अपने भोजन व पहनावे को पूरी तरह से त्यागकर सादे वस्त्र धारण करने की राह चुनी।

गुरुकुल कांगड़ी और स्वामी श्रद्धानंद से मुलाकात: 'महात्मा' शब्द की नींव

हरिद्वार प्रवास के दौरान गुरुकुल कांगड़ी आश्रम बापू का प्रमुख केंद्र रहा। वहां के विद्यार्थियों, आचार्यों और स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम) के साथ उनके लंबे विचार-विमर्श हुए। गुरुकुल की अनुशासित जीवनशैली, मातृभाषा में शिक्षा का विचार और स्वदेशी की भावना ने गांधी जी के 'सर्वोदय' और 'सत्याग्रह' के सिद्धांतों को गढ़ने में बहुत मदद की। इतिहासकार मानते हैं कि हरिद्वार में स्वामी श्रद्धानंद और वहां के माहौल के साथ हुए इस अनूठे संवाद ने ही मोहनदास के भीतर छिपी आत्मिक ऊर्जा को बाहर निकाला। कई ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, स्वामी श्रद्धानंद जी ही वे पहले व्यक्तित्व थे जिन्होंने मोहनदास कर्मचंद गांधी के महान त्याग और सत्यनिष्ठा को देखते हुए उन्हें 'महात्मा' कहकर संबोधित करने की परंपरा की नींव रखी थी।

हरिद्वार का वो टर्निंग पॉइंट जिसने बदला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का चेहरा

हरिद्वार में बिताए गए उन दिनों ने गांधी जी को यह स्पष्ट कर दिया कि भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए केवल राजनीतिक लड़ाई काफी नहीं है, बल्कि देशवासियों को मानसिक, सामाजिक और आत्मिक रूप से आजाद कराना होगा। हरिद्वार से लौटकर ही बापू ने साबरमती आश्रम की स्थापना की और अपने आंदोलन में स्वच्छता, छुआछूत निवारण, खादी तथा अहिंसा को प्राथमिक शर्त बनाया। जो सत्याग्रह उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में शुरू किया था, उसे भारतीय जमीन और भारतीय जनमानस के अनुकूल बनाने का विचार इसी हरिद्वार यात्रा के दौरान परिपक्व हुआ। कह सकते हैं कि हरिद्वार की पावन माटी ने मोहनदास के विचारों को तराशकर उन्हें एक जननेता और भारत के राष्ट्रपिता के रूप में ढालने का काम किया।

आधुनिक युग में बापू के हरिद्वार प्रवास के संदेश और प्रासंगिकता

आज भी हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी और गंगा के घाटों पर बापू की उन स्मृतियों को बड़े ही आदर और गर्व के साथ संजोकर रखा गया है। 1915 की वह ऐतिहासिक हरिद्वार यात्रा आज के दौर में भी हमें यह सिखाती है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो जमीन से जुड़ा हो, जो समाज की कमियों को स्वीकार कर उसमें सुधार का साहस रखे। बापू ने हरिद्वार से स्वच्छता और सेवा का जो संदेश दिया था, वह आज के 'स्वच्छ भारत अभियान' की असली प्रेरणा है। 1915 में हरिद्वार आया एक साधारण बैरिस्टर जब वहां से लौटा तो वह केवल एक वकील नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों का मार्गदर्शक और इतिहास को बदलने वाला 'महात्मा' बन चुका था।