क्या हरीश रावत के 'पुष्पा' बनने और कांग्रेस आलाकमान के सामने न झुकने के पीछे विधायक उमेश कुमार

क्या हरीश रावत के 'पुष्पा' बनने और कांग्रेस आलाकमान के सामने न झुकने के पीछे विधायक उमेश कुमार

उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर से बेहद दिलचस्प और गरमागरम मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां राज्य के दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के तेवर इन दिनों खासे चर्चा का विषय बने हुए हैं। अपनी राजनीतिक शैली और जनता के बीच अपनी पैठ के लिए पहचाने जाने वाले हरीश रावत के हालिया बयानों और रुख को देखकर राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या वे पार्टी आलाकमान के आगे झुकने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं। लोकप्रिय फिल्म 'पुष्पा' के मशहूर डायलॉग "झुकता नहीं साला..." की तर्ज पर हरीश रावत के बागी और अड़ियल तेवरों ने दिल्ली से लेकर देहरादून तक कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नींद उड़ा दी है। पार्टी के भीतर यह सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि आखिर वह कौन सी परिस्थितियां और राजनीतिक समीकरण हैं जिनके कारण कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरों में शुमार हरीश रावत इतने आक्रामक और स्वतंत्र रूप से फैसले ले रहे हैं। राज्य के राजनीतिक विश्लेषक इस बात का बारीकी से विश्लेषण कर रहे हैं कि हरीश रावत की यह बगावत पार्टी के अंदरूनी असंतोष का परिणाम है या इसके पीछे कोई बहुत बड़ा सियासी मोहरा काम कर रहा है।

क्या खानपुर के निर्दलीय विधायक उमेश कुमार से जुड़ी है इस पूरी सियासी कहानी की जड़?

जब इस पूरी राजनीतिक उठापटक की तह तक जाने की कोशिश की जाती है, तो राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नाम बहुत तेजी से उभरकर सामने आता है, और वह नाम है खानपुर विधानसभा सीट से विधायक उमेश कुमार का। उत्तराखंड की राजनीति में अपनी बेबाक शैली, आक्रामक तेवरों और ताबड़तोड़ खुलासों के लिए पहचाने जाने वाले विधायक उमेश कुमार और हरीश रावत के बीच के समीकरण इन दिनों राज्य की सियासत का सबसे गर्म टॉपिक बने हुए हैं। ऐसा माना जा रहा है कि प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में लगातार बदलते समीकरणों और क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच शक्ति संतुलन को बनाए रखने में उमेश कुमार की बढ़ती सक्रियता ने पारंपरिक दलों के नेताओं की थाह लेनी शुरू कर दी है। राजनीतिक जानकारों का यह कहना है कि हरीश रावत के राजनीतिक जीवन का लंबा अनुभव और उनके सामने खड़े होने वाले स्थानीय विकल्प, विशेष रूप से उमेश कुमार जैसे मुखर नेताओं की मौजूदगी, राज्य में कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को और अधिक हवा दे रही है। यही वजह है कि हरीश रावत न केवल क्षेत्रीय मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रख रहे हैं, बल्कि पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव या आलाकमान के एकतरफा फैसलों के आगे आसानी से घुटने टेकने से साफ इनकार कर रहे हैं।

कांग्रेस आलाकमान के लिए क्यों सिरदर्द बन गए हैं हरीश रावत के अड़ियल तेवर?

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बैठे कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए यह स्थिति किसी बड़े सिरदर्द से कम साबित नहीं हो रही है, क्योंकि एक तरफ पार्टी देश भर में अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने के लिए एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ उत्तराखंड जैसे सीमावर्ती राज्य में उनके सबसे बड़े नेता का यह बागी रुख संगठन की एकजुटता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। आलाकमान की तरफ से कई बार समझाने-बुझाने और समन्वय बिठाने की कोशिशें की जा चुकी हैं, लेकिन हरीश रावत ने हर बार यह साबित कर दिया है कि वह अपनी शर्तों और राजनीतिक वजन के हिसाब से ही मैदान में उतरेंगे। राज्य के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच यह संदेश साफ तौर पर जा रहा है कि हरीश रावत अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को करारा जवाब देने के लिए किसी भी बड़े संघर्ष से पीछे हटने वाले नहीं हैं। चाहे वह स्थानीय निकाय चुनाव हों या फिर संगठन के भीतर पदों का बंटवारा, हर मोर्चे पर उनका यह 'पुष्पा' अंदाज पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आखिर इस अनुभवी नेता को कैसे मैनेज किया जाए।

उत्तराखंड के भविष्य के राजनीतिक समीकरण और आने वाले दिनों की बड़ी हलचल

आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत किस करवट बैठेगी, यह इस बात पर बहुत हद तक निर्भर करेगा कि कांग्रेस आलाकमान और हरीश रावत के बीच चल रहे इस शीत युद्ध का अंत कैसे होता है। यदि पार्टी नेतृत्व उनके बागी तेवरों के आगे झुकता है, तो इससे अन्य नेताओं के हौंसले भी बुलंद हो सकते हैं, और यदि कड़ा रुख अपनाया जाता है, तो राज्य में कांग्रेस पार्टी के टूटने या बिखरने का खतरा और अधिक गहरा सकता है। दूसरी तरफ, उमेश कुमार जैसे निर्दलीय और आक्रामक विधायक इस पूरे राजनीतिक ड्रामे का लाभ उठाकर अपनी स्थिति को और मजबूत करने की ताक में हैं, जिससे आने वाले चुनावी भविष्य के समीकरण पूरी तरह से बदलते हुए नजर आ रहे हैं। राज्य की आम जनता और राजनीतिक प्रेक्षक इस बात पर टकटकी लगाए बैठे हैं कि हरीश रावत का यह नया राजनीतिक दांव अंततः किसके पक्ष में जाता है और क्या कांग्रेस पार्टी इस आंतरिक तूफान से खुद को बचा पाने में कामयाब हो पाती है या नहीं।