नवंबर में निकलता है पहाड़ का सबसे खास शहद, खूब है डीमांड, जानिए क्या है इसकी खासियत

नवंबर में निकलता है पहाड़ का सबसे खास शहद, खूब है डीमांड, जानिए क्या है इसकी खासियत

सर्दियों की सुगबुगाहट शुरू होते ही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के दुर्गम पहाड़ी इलाकों से एक बेहद अनूठी और सेहतमंद खबर सामने आ रही है। साल के ग्यारहवें महीने यानी नवंबर में हिमालय की ऊंची वादियों में 'पहाड़ी कड़वा शहद' और प्राकृतिक फूलों का खास शहद निकालने का काम अपने चरम पर पहुंच जाता है। इस खास मौसम में तैयार होने वाले शहद की मांग देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के बाजारों में अचानक कई गुना बढ़ जाती है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान दोनों ही नवंबर महीने में छत्तों से निकाले जाने वाले इस प्राकृतिक शहद को किसी अमृत से कम नहीं मानते हैं। लेकिन आखिर ऐसा क्या खास है जो पहाड़ों के इस शहद को आम शहद से पूरी तरह अलग और बेहद कीमती बनाता है, और क्यों लोग इसे खरीदने के लिए महीनों पहले से एडवांस बुकिंग कराते हैं, जानिए इस रिपोर्ट में।

नवंबर में ही क्यों निकलता है पहाड़ों का यह सबसे खास और कीमती शहद

पहाड़ों में नवंबर के महीने में शहद निकलने के पीछे एक बहुत बड़ा प्राकृतिक और जैविक कारण छिपा हुआ है। अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत में हिमालय की वादियों में खास किस्म की जड़ी-बूटियां, दुर्लभ जंगली फूल और औषधीय पौधे जैसे 'कुरी', 'चीड़' और दुर्लभ 'कड़वी जड़ी-बूटियां' पूरी तरह खिल उठती हैं। इस मौसम में जंगली मधुमक्खियां (विशेषकर एपिस लेबोरीओसा और एपिस सेराना) केवल इन्हीं औषधीय फूलों से मकरंद (नेक्टर) इकट्ठा करती हैं। चूंकि इस समय तक तापमान गिरने लगता है और हवा में नमी कम हो जाती है, इसलिए इस शहद में पानी की मात्रा बेहद कम और औषधीय तत्वों का सांद्रण (Concentration) सबसे अधिक होता है। यही वजह है कि नवंबर महीने में तैयार होने वाला यह शहद गुणवत्ता के मामले में पूरे साल के शहद से सबसे ऊपर माना जाता है।

औषधीय गुणों का भंडार: क्यों इस शहद की बाजार में रहती है बेतहाशा डिमांड

नवंबर के पहाड़ी शहद को सेहत के लिहाज से कुदरत का सबसे बड़ा वरदान माना जाता है। आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें प्रचुर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। सर्दियों के मौसम में होने वाले सामान्य सर्दी-जुकाम, खांसी और गले की खराश से लेकर यह जोड़ों के दर्द, अस्थमा और पाचन संबंधी समस्याओं में अचूक दवा की तरह काम करता है। इसके अलावा, मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों के लिए भी सीमित मात्रा में इस प्राकृतिक कड़वे शहद का सेवन बेहद फायदेमंद माना गया है क्योंकि यह शरीर में ब्लड शुगर लेवल को अचानक से नहीं बढ़ाता। यही वजह है कि देश के बड़े-बड़े शहरों से लेकर विदेशों तक में इस शहद की मुंह मांगी कीमत देने के लिए लोग तैयार रहते हैं।

पारंपरिक तरीके से छत्तों से निकाला जाता है शहद, जान जोखिम में डालकर काम करते हैं स्थानीय ग्रामीण

हिमालयी क्षेत्रों में इस शहद को निकालने की प्रक्रिया बेहद कठिन, साहसिक और पारंपरिक होती है। स्थानीय ग्रामीण और मौसमी मधुमक्खी पालक ऊंची चट्टानों, विशाल पेड़ों और दुर्गम पहाड़ियों पर बने मधुमक्खियों के प्राकृतिक छत्तों से शहद निकालने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं। वे बिना किसी रासायनिक या आधुनिक मशीनरी के, पुरानी पारंपरिक धुएं की विधि का उपयोग करके शहद इकट्ठा करते हैं। इस शहद को न तो तेज आंच पर पकाया जाता है और न ही इसमें किसी भी प्रकार की मिलावट या प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं। छत्ते से सीधे छानकर बोतलों में पैक किए जाने के कारण इसके सभी प्राकृतिक एंजाइम्स और पोषण तत्व पूरी तरह से सुरक्षित रहते हैं।

असली और शुद्ध पहाड़ी शहद की पहचान कैसे करें: घर बैठे ऐसे परखें शुद्धता

बाजार में शुद्ध शहद के नाम पर हो रही मिलावटखोरी के बीच असली पहाड़ी शहद की पहचान करना बेहद आसान है। नवंबर में निकलने वाला यह शुद्ध शहद आमतौर पर गहरे सुनहरे या हल्के भूरे रंग का होता है और इसकी महक में आपको प्राकृतिक जड़ी-बूटियों की भीनी-भीनी खुशबू महसूस होगी। यह शहद कमरे के तापमान पर आसानी से जमता नहीं है और यदि इसे पानी में डाला जाए तो यह तुरंत घुलने के बजाय कटोरी के तल में बैठ जाता है। इसके अलावा, इस शहद का स्वाद शुरुआत में हल्का मीठा और बाद में हल्का सा कड़वा या कसैला अहसास देता है, जो इसके औषधीय पौधों से बने होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था और पहाड़ी ग्रामीणों के लिए आजीविका का बड़ा जरिया

पहाड़ों में नवंबर के महीने में मिलने वाला यह खास शहद केवल सेहत का खजाना ही नहीं है, बल्कि यह स्थानीय पहाड़ी ग्रामीणों और युवाओं के लिए स्वरोजगार का एक बहुत बड़ा जरिया भी बन चुका है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा 'वोकल फॉर लोकल' और ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने के बाद अब पहाड़ी क्षेत्रों के किसान इस शुद्ध शहद की पैकेजिंग करके सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और ई-कॉमर्स वेबसाइट्स के जरिए देश भर में बेच रहे हैं। इससे न केवल पहाड़ों से होने वाले पलायन पर रोक लग रही है, बल्कि दुनिया भर के लोगों को अपने घर बैठे हिमालय की वादियों का सबसे शुद्ध और औषधीय शहद प्राप्त हो रहा है।