ऑरेंज अलर्ट था, फिर भी आसमान में क्यों उड़ा हेलीकॉप्टर? चमोली हादसे के बाद यूकाडा पर उठे सवाल
देवभूमि उत्तराखंड के बेहद संवेदनशील और दुर्गम पहाड़ी जिले चमोली से आई हृदय विदारक हेलीकॉप्टर दुर्घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। चारधाम यात्रा और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उड़ान भरने वाले श्रद्धालुओं और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर से बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है। मौसम विभाग (IMD) द्वारा पूरे क्षेत्र में भारी बारिश, तेज हवाओं और घने कोहरे को लेकर पहले से ही 'ऑरेंज अलर्ट' (Orange Alert) जारी किया गया था। इसके बावजूद यात्रियों से भरे हेलीकॉप्टर को खतरनाक और अनिश्चित मौसम में उड़ान भरने की इजाजत किसने और क्यों दी? इस दर्दनाक चमोली हादसे के बाद अब राज्य की मुख्य नागरिक उड्डयन एजेंसी 'उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण' (UCADA - यूकाडा) सीधे तौर पर सवालों के घेरे में आ गई है। स्थानीय जनता, पीड़ित परिवारों और विमानन विशेषज्ञों ने यूकाडा और संबंधित निजी ऑपरेटरों की भारी लापरवाही पर उंगली उठाते हुए उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग तेज कर दी है।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मौसम कब करवट बदल ले, इसका सही अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) और मौसम विभाग ने पर्वतीय क्षेत्रों में उड़ान संचालन के लिए बेहद सख्त मानक और मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs) तय की हुई हैं। लेकिन चमोली में हुए इस भीषण हादसे ने यह साफ कर दिया है कि चंद पैसों की लालच, कमर्शियल दबाव या फिर सुरक्षा नियमों की अनदेखी के चलते किस तरह इंसानी जिंदगियों को मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। जैसे ही यह खबर फैली कि मौसम की गंभीर चेतावनी के बाद भी हेलीकॉप्टर ने टेक-ऑफ किया था, वैसे ही प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया और नागरिक उड्डयन विभाग की जवाबदेही पर तीखे सवाल उठने लगे हैं।
मौसम विभाग की 'ऑरेंज अलर्ट' की चेतावनी को क्यों किया गया नजरअंदाज?
घटना वाले दिन सुबह से ही चमोली और आसपास के उच्च हिमालयी घाटियों में मौसम का मिजाज बेहद खराब था। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने स्थानीय प्रशासन और उड्डयन कंपनियों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए क्षेत्र में तेज हवाएं चलने, विजिबिलिटी (दृश्यता) कम होने और भारी बारिश की संभावना के तहत ऑरेंज अलर्ट जारी किया था। उड्डयन नियमों के मुताबिक, जब भी किसी क्षेत्र में ऑरेंज या रेड अलर्ट घोषित होता है, तो वहां चार्टर्ड या यात्री हेलीकॉप्टर सेवाओं को पूरी तरह से रोक देना चाहिए जब तक कि मौसम पूरी तरह से साफ न हो जाए।
लेकिन इसके बावजूद, सुरक्षा प्रोटोकॉल को ताक पर रखते हुए हेलीकॉप्टर ने अपने गंतव्य के लिए उड़ान भरी। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद हेलीकॉप्टर घने बादलों और धुंध की चपेट में आ गया, जिससे पायलट की विजिबिलिटी शून्य हो गई और पहाड़ी से टकराने के बाद हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) और यूकाडा के सुरक्षा अधिकारियों ने मौसम की रिपोर्ट का जायजा नहीं लिया था? या फिर निजी कंपनियों पर नियम कायदों को लागू करने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद ही नहीं था?
यूकाडा की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल: क्या केवल कागजों तक सीमित हैं सुरक्षा नियम?
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के दौरान हर साल लाखों श्रद्धालु केदारनाथ, बद्रीनाथ और अन्य धामों के लिए हेलीकॉप्टर सेवाओं का उपयोग करते हैं। यूकाडा की प्राथमिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि राज्य में काम करने वाली सभी निजी हेलीकॉप्टर कंपनियां डीजीसीए के सुरक्षा नियमों का 100% पालन करें। लेकिन इस हादसे के बाद स्थानीय निवासियों और उड्डयन क्षेत्र के जानकारों का आरोप है कि यूकाडा का नियंत्रण इन कंपनियों पर बेहद ढीला हो चुका है। कंपनियां अधिक से अधिक ट्रिप लगाने और मुनाफा कमाने के चक्कर में खराब मौसम में भी उड़ानों को रद्द करने से हिचकिचाती हैं।
जांच में यह बात भी सामने आ रही है कि पर्वतीय हवाई पट्टियों पर स्थापित 'वेदर मॉनिटरिंग सिस्टम' (Weather Monitoring Systems) कई बार ठीक से काम नहीं करते या फिर उनसे मिलने वाली चेतावनियों को पायलट और ऑपरेटर अनदेखा कर देते हैं। जब मौसम विभाग का ऑरेंज अलर्ट पहले से मौजूद था, तो यूकाडा ने तुरंत प्रभाव से सभी उड़ानों पर रोक क्यों नहीं लगाई? क्या यात्रियों की सुरक्षा से बढ़कर कंपनियों का व्यावसायिक फायदा है? इन तीखे सवालों का जवाब देने में यूकाडा के अधिकारी फिलहाल बचते नजर आ रहे हैं और पूरी जिम्मेदारी जांच रिपोर्ट आने तक टालने की कोशिश कर रहे हैं।
डीजीसीए और शासन का कड़ा रुख: उच्चस्तरीय जांच के आदेश और ब्लैक बॉक्स की तलाश
चमोली हादसे की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने तुरंत हरकत में आते हुए इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। डीजीसीए की एक विशेष एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन टीम (AAIB) तुरंत मौके पर पहुंच चुकी है और दुर्घटनास्थल से मलबे के सैंपल जुटाने के साथ-साथ हेलीकॉप्टर के 'ब्लैक बॉक्स' (Flight Data Recorder) और सीवीआर (Cockpit Voice Recorder) को ढूंढने में जुटी है। इस जांच में पायलट और एटीसी के बीच हुई आखिरी बातचीत, हेलीकॉप्टर का मेंटेनेंस रिकॉर्ड और उस समय की मौसम रिपोर्ट की गहराई से समीक्षा की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने भी हादसे पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि इस पूरे मामले में यदि किसी भी स्तर पर यूकाडा के अधिकारियों या निजी ऑपरेटर की लापरवाही सामने आती है, तो उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने फिलहाल चमोली और आसपास के संवेदनशील रूट्स पर सभी प्रकार की हेलीकॉप्टर सेवाओं पर अगले आदेश तक अस्थायी रोक लगा दी है ताकि पूरे सेफ्टी ऑडिट की प्रक्रिया को पूरा किया जा सके।
निष्कर्ष: जब तक तय नहीं होगी जवाबदेही, तब तक सुरक्षित नहीं होगा हिमालयी आसमान
चमोली में हुआ यह भीषण हेलीकॉप्टर हादसा केवल एक प्राकृतिक दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही का एक जीता-जागता उदाहरण बन गया है। मौसम विभाग के ऑरेंज अलर्ट की अनदेखी करके यात्रियों की जान जोखिम में डालना एक ऐसा अपराध है जिसकी भरपाई किसी भी मुआवजे से नहीं की जा सकती। जब तक यूकाडा जैसी नोडल एजेंसियों की जवाबदेही तय नहीं होगी और दोषी ऑपरेटरों के लाइसेंस रद्द कर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक देवभूमि के आसमान में उड़ने वाले यात्रियों की सुरक्षा अधर में ही लटकी रहेगी। अब देखना यह होगा कि इस जांच के बाद व्यवस्था में क्या वास्तविक सुधार आता है या फिर यह घटना भी महज एक जांच रिपोर्ट की फाइलों में दबकर रह जाती है।